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#Changemaker : Video : सत्ता की कुर्सी मिलते ही वोटरों को प्रजा समझने वालों की मानसिकता में हो बदलाव

-चेंजमेकर अभियान में खुलकर बोले अधिवक्ता  

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श्रीगंगानगर।

मतदान जिस दिन होता है उस दिन वोटर को राजा की संज्ञा दी जाती है लेकिन जिन बोटरों के बलबूते पर सरकार बनी है उनको प्रजा की श्रेणी में आंका जाता है। यहां तक कि अपनी फरियाद लेकर पहुंची जनता को मंत्री जी की चौखट पर मिन्नत निकालने को मजबूर किया जाता है। राजनीति की यह मानसिकता अब बदलनी चाहिए। यह कहना है अधिकांश अधिवक्ताओं को। रातस्कान पत्रिका के Changemakers महाअभियान के तहत जिला मुख्यालय पर बार एसोसिएशन की ओर से 'स्वच्छ करे राजनीति' विषय पर आयोजित संगोष्ठी गुरुवार को आयोजित की गई। इस दौरान अधिवक्ताओं का कहना था कि देश और प्रदेश में जिस तरीके से राजनीति का माहौल चल रहा है, उसे तत्काल बदलने की जरुरत है। जनता को किसी राजनीतिक दल की जरुरत नहीं बल्कि अच्छे लोगों की जरुरत है। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता बार संघ के अध्यक्ष नितिन वाट्स ने की।


देश की राजनीति अब धर्मनिरक्षेपता की बजाय कट्टरवादिता बन गई है। देश के संविधान की पालना नहीं हो रही है। ऐसे में जररूत है स्वच्छ राजनीति की। पत्रिका के Changemakers अभियान के माध्यम से यह शुरूआत की गई है, सराहनीय है। चुनावी घोषणा पत्र के माध्यम से गुमराह करने का खेल चल रहा है लेकिन हकीकत कोसो दूर है। रोजगार और महंगाई के मुद्दों पर जिन्ना की फोटो टांगने या नहीं टांगने का मुद्दा हावी हो रहा है।

- भूरामल स्वामी, वरिष्ठ अधिवक्ता

बदलते परिवेश में छिछोरी राजनीति की बजाय अच्छे नागरिक बनाने की जरुरत है। संस्कारवान नागरिक बनाने के लिए समाज को एकजुट होकर काम करना होगा। संवेदना और मर्यादित जैसे संस्कारों का परिणाम तभी आएगा जब हम खुद में बदलाव करेंगे। पत्रिका की इस मुहिम ने इस विषय को चिंतन करने के लिए शुरुआत कर दी है। एक पार्टी से बंधने की बजाय साफ छवि के लोग राजनीति में आए तो बदलाव होना तय है।
- ओम रावल, वरिष्ठ अधिवक्ता


पैराशूट प्रत्याशी जनता पर थोंपे जा रहे है, यह परिपार्टी महज चुनाव जीतने के लिए हर राजनीतिक दल कर रहा है। यह परम्परा अब थमनी चाहिए। यह दौर अब बदल चुका है। इससे धरातल पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की हकीकत को बयां नहीं होने दिया जाता। राजनीतिक दलों की जवाबदेही तय हो, इसके लिए सामूहिक प्रयास करने होंगे।

- सुरेन्द्र स्वामी, अधिवक्ता

देश की राजनीति किस ओर जा रही है, जगजाहिर है। आम आदमी की पीड़ा को जिस तरीके से मीडिया उजागर करता है तो राजनीतिक दल क्यों नहीं। जररूत है स्कूली स्तर पर ही संवेदनशील पाठयक्रम को पढ़ाने की, इससे संस्कारवान नागरिक बन पाएंगे तभी समाज में नई सोच विकसित हो पाएगी। सार्वजनिक मंच आए तो विरोधी की बात भी सुना जाएं, एक तरफा अपनी ही बात को थोपना सही मायने में राजनीति नहीं है।
- प्रदीप धेरड़, अधिवक्ता


चेंजमर्कर बनाने के लिए पत्रिका खुद तय करें, यह निर्धारण उस संबंधित व्यक्ति के व्यक्तित्व और पृष्ठभूमि को देखकर किया जाएं। इलक्ट्रौनिक्स मीडिया ने जिस तरीके से जनता को गुमराह करनी वाली सामग्री परोसन रहे है। ऐसे में पत्रिका अपनी साख के अनुरुप ही इस मुहिम को घर-घर पहुंचाने का काम करें। मीडिया खुद Changemaker बनाए ताकि बदलाव आ सके।

- ईसर सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता

चरित्रहीन व्यक्तियो को किसी भी कीमत पर कोई भी राजनीति पार्टी टिकट नहीं दे तो पचास प्रतिशत बदलाव आ सकता है। लेकिन दुर्भाग्य है देश और प्रदेश का। अदलू बदलू प्रत्याशी से केवल जीतना जरूरी नहीं है। यही फिलहात चल रहा है। आर्थिक आधार पर आरक्षण कर दिया जाएं तो राजनीतिक में स्वत: ही स्वच्छता आ सकता है। Changemaker अभियान का परिणाम भले ही एक साल बाद आएं लेकिन आएगा जरूर।
- राजेन्द्र कुमार शर्मा, अधिवक्ता


देश में 75 प्रतिशत ऐसे लोग है जिनको संविधान के बारे में पता नहीं है। ऐसे में उनके अधिकार और कर्तव्य खूंटी पर टंगे रहते है। अधिकारों का हनन होना अब आम बात हो गई लेकिन संविधान की पालना कराने की डयूटी हर नागरिक की भी है। ऐसे में इस अभियान की महत्ता बढ़ गई है। पत्रिका समय समय पर ऐसे अच्छे लेखकों के लेखों को रोचकता के साथ पाठय सामग्री के रूप में इस्तेमाल करें तो ज्ञानवर्धक होगा।

- सज्जन सिंह, पूर्व अध्यक्ष बार संघ

जिस दिन वोटिंग होती है तो वोटर को मान और सम्मान के साथ राजा की तरह बूथ तक लाया जाता है। जैसे ही चुनाव हुए उसके बाद उन्हीं वोटरों को गुलाम की तरह प्रजा के रूप में देखा जाता है। लोकतंत्र प्रक्रिया का दावा हम भले ही करें लेकिन हकीकत यही है। मंत्रीजी को ज्ञापन देने के लिए असहाय लोगों की तरह खड़े करने को मजबूर किया जाता है। तानाशाही प्रवृति को दूर कर योग्य व्यक्ति को समर्थन करने की जरूरत है।
- संजीव दीक्षित, पूर्व अध्यक्ष बार संघ


दोषारोपण की मानसिकता बदलने की जरुरत है। एक आदमी भी बदलाव कर सकता है। इसका जीवांत उदाहरण टी शेषण रहे है, उन्हेांने चुनाव आयोग में खामियों को दूर करते हुए स्वायत्त संस्था बना दी। ऐसा ही यह अभियान है जो देश के प्रति समर्पित लोगों को समाज के समक्ष आगे लाना है। विचाराधारा अलग हो लेकिन देश हित में होना चाहिए।

- अरुण बिश्नोई, अधिवक्ता

दूषित राजनीति का सबसे बड़ा कारण राजनीतिकों को अधिक अधिकार मिल चुके है। भ्रष्टाचार के आंकठ में डूबे राजनीतिक लोगों के कारण राजनीतिक दागदार हो गई है। ऐसे अधिकारों में यदि कटौती कर दी जाएं तो स्वत: ही स्वच्छ राजनीति का सपना साकार होने लगेगा। पत्रिका की यह मुहिम अब रूकनी नहीं चाहिए, जब तक पूरा सिस्टम बदल नहीं जाएं तब तक चलनी चाहिए।
- नितिन वाट्स, अध्यक्ष बार एसोसिएशन श्रीगंगानगर।


देश में राजनीति में नीति खत्म हो गई है। आम जनता राजनीति से दूर हो रही है। पेशेवर राजनीतिक घराने व उनके परिजनों का राजनीति दलों पर कब्जा हो गया है। पाटियों में आंतरिक लोकतंत्र विलुप्त हो गया है। धर्म और जाति के नाम पर राजनीतिक का अंत हो, ऐसी स्वच्छ राजनीति की जरुरत है।

- श्रीकृष्ण कुक्कड़, अधिवक्ता

वर्तमान राजनीति का दौर तानाशाही शासन हो गई है। प्रशासनिक अधिकारियों की जवाब देही तक नहीं है। जिन लोगों को वोट दिया गया वे कुर्सी मिलते ही गायब हो गए। लोग अपनी पीड़ा को लेकर कहां जाएं, कौन सुनवाई करेगा, यह बताने को कोई तैयार नहीं है। जनता की सोच विकसित करने की जरुरत है, तभी बदलाव आएगा।
- रोहताश यादव, अधिवक्ता

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