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एक दो नहीं बल्कि 36 तरह के साफे बांधते हैं मोहनलाल

पूर्व उपराष्ट्रपति व मुख्यमंत्री सहित कई अधिकारियों को बांध चुके हैं साफा श्रीगंगानगर. अक्सर बोलचाल में कहा जाता है कि 12 कोस (करीब 34 कि.मी.) पर बोली बदलती है, उसी प्रकार 12 कोस पर साफे बांधने के पेच में भी फर्क आता है। जी हां, साफों का एक अलग ही संसार है।

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एक दो नहीं बल्कि 36 तरह के साफे बांधते हैं मोहनलाल

एक दो नहीं बल्कि 36 तरह के साफे बांधते हैं मोहनलाल

पूर्व उपराष्ट्रपति व मुख्यमंत्री सहित कई अधिकारियों को बांध चुके हैं साफा

श्रीगंगानगर. अक्सर बोलचाल में कहा जाता है कि 12 कोस (करीब 34 कि.मी.) पर बोली बदलती है, उसी प्रकार 12 कोस पर साफे बांधने के पेच में भी फर्क आता है। जी हां, साफों का एक अलग ही संसार है। इसको जितना पहनना आसान है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल एवं टेढ़ा काम इसको बांधना है, लेकिन श्रीगंगानगर के जवाहरनगर के रहने वाले मोहनलाल सारस्वत के लिए साफा बांधना बेहद आसान सा काम है। सारस्वत एक दो नहीं बल्कि 36 तरह के साफे बांधने में माहिर हैं। उनके बांधे हुए साफे पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत व प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तक पहन चुके हैं। इतना ही नहीं गणतंत्र दिवस एवं स्वाधीनता दिवस पर अधिकारियों के साफे बांधने के लिए भी मोहनलाल को ही याद किया जाता है। 1981 से लगातार वह दोनों राष्ट्रीय पर्वों पर साफे बांधते आ रहे हैं। खास बात तो यह है कि मात्र पांचवीं तक पढ़े मोहनलाल ने यह कला खुद ब खुद सीखी और इसमें निखार लाते गए। इस कला के लिए वो सात बार जिला प्रशासन से सम्मानित भी हो चुके हैं। विदित रहे कि 71 वर्षीय मोहनलाल पांच दशक से साफा बांधने का काम कर रहे हैं।

प्रांत एवं जाति के अलग अलग साफे
मोहनलाल ने बताया कि प्रदेश एवं जाति के हिसाब से अलग-अलग साफे होते हैं। इनके रंग और बांधने का तरीका भी अलग होता है। पुत्र, पिता एवं दादा के साफे भी अलग-अलग होते हैं। सबसे बड़ा साफा नौ मीटर का होता है। अधिकतर समाजों में इसी का प्रचलन है। पंजाबी समुदाय में पांच मीटर का साफा ज्यादा चलता है। साफे की तरह ही पगड़ी होती है लेकिन इसकी लंबाई 28 मीटर होती है। पगड़ी बांधने में साफे से ज्यादा समय लगता है। साधारण साफा बांधने में पांच से सात मिनट का समय लगता है।

युवाओं में क्रेज ज्यादा
कभी साफा गिने-चुने लोगों या बुजुर्गों तक ही सीमित था, लेकिन अब युवाओं का रुझान भी साफों के प्रति बढ़ा है। विशेषकर इन दिनों शादी समारोहों में साफे का प्रचलन ज्यादा हो गया है। मोहनलाल ने बताया कि जब उन्होंने यह काम शुरू किया तब गिने-चुने लोग ही साफा बंधवाते थे और तो अब इस काम में फुरसत नहीं मिलती। उन्होंने अपने पुत्र प्रभुदयाल को भी यह कला सिखाई है। बीएड होने के बावजूद प्रभुदयाल पिता की तरह ही साफे बांधने में महारत हासिल कर चुके हैं।

हाेली पर बढ़ जाता है काम
होली पर मोहनलाल साफा बांधने का काम बड़े स्तर पर करते हैं, क्योंकि साफा बांधना गांव मे होली पर ही सीखा था। सबसे मुश्किल काम कछी घोड़ी नृत्य में नृक के लिए तैयार होने वाला साफा होता है, जो 36 से 42 मीटर लंबा होता है और इसको बांधने में चार से पांच घंटे लगते हैं। मूलत: बीकानेर जिले के मोमासर गांव के रहने वाले मोहनलाल की पहले पान की दुकान थी। वहां वो साफा बांधकर बैठते थे। दुकान पर आने वाले उनसे साफे के बारे में भी पूछते और फिर बंधवाने भी लगे। साफ बांधने के मामले में आज श्रीगंगानगर एवं आसपास के क्षेत्र में मोहनलाल का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है।