श्रीगगानगर. किसी भी बीमार व्यक्ति की सेवा नर्स या पैरा मेडिकल स्टाफ की ओर से जिस निष्ठा, आत्मीयता, त्याग और समर्पण के साथ सहजता से की जाती है। रोगी को नकारात्मक सोच से बाहर निकालकर उसे नया जीवन देने में नर्स की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। रोगी की सेवा करना सबसे बड़ा धर्म मानने वाली ये नर्सेज अपनी निजी जिंदगी को ताक पर रख कर जिस तरह से मरीजों की सेवा में तल्लीन रहती है, वैसा अन्य पेशे में कम ही देखने को मिलता है। इस सेवा कार्यों के बूते स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने पहचान भी बनाई है।
गांव जगमीतवाला की रहने वाली सुखविन्द्र कौर यहां राजकीय जिला चिकित्सालय के वृद्धजन वार्ड में बेहतर सेवा करने में अग्रणी भूमिका निभा रही है। वर्ष 2016 में जीएनएम कोर्स के बाद सरकारी सेवा में आई तो तीन साल सूरतगढ़ में ड्यूटी दी। वहां से जिला चिकित्सालय में आई तो वृद्धजन वार्ड में लगा दिया। इन्सान की सेवा को ही सबसे बड़ा धर्म मानने वाली सुखविन्द्र कौर कहती है कि इस उम्र में लोग अपना दर्द लेकर आते है तो उनकी सेवा करने से उसे सुकून मिलता है। पिता आर्मी में कार्यरत है। इस कारण लोगों की सेवा के संस्कार रगों में है।
इस बीच, चक काूलवाला के स्वास्थ्य केन्द्र में कार्यरत शीलाकुमारी का कहना है कि अपने हाथों से भला करने का प्रयास किया जाता है। रामदेव कॉलोनी में रहने वाली इस स्वास्थ्य कार्यकर्ता का मानना है कि नर्सिंग क्षेत्र में पल्स पोलियो, परिवार कल्याण के साथ साथ नि:संतान दंपतियों के बच्चों होने के लिए उपचार में सहयोग करने में सुकून मिलता है लेकिन अनावश्यक कार्यों का बोझ नर्सिंग के काम पर असर डालता है। अपने संगठन के बूते इस स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने पिछले 11 दिन से जिला मुख्यालय पर धरना तक दे रखा है।
इधर, जिला चिकित्सालय के लेबर रूम में कार्यरत महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता रिंकी बाला भी रोगियों की सेवा में जुटी हुई है। ऑपरेशन के बाद दर्द से कराहती प्रसूताओं की सेवा करने से उन्हें एक अलग तरह का सुख मिलता है। रिंकीबाला बताती है कि कभी-कभी ऐसी भी प्रसूताएं उनके वार्ड में भर्ती होती है, जिनके परिवार में कोई भी नहीं होता। तब उनकी जिम्मेदारी और भी बढ जाती है। ऐसे मरीजों का उन्हें अलग से ख्याल रखना होता है। रोगी और नर्स के बीच शुरू हुआ यह रिश्ता बाद में आत्मीयता में बदल जाता है।
परिवार की जिम्मेदारियों के साथ-साथ समाज सेवा भी
डूंगरसिंहपुरा गांव के पीएचसी में कार्यरत कर्मजीत कौर का कहना है कि यही एक ऐसी नौकरी है जिसमें परिवार की जिम्मेदारियों को संभालने के साथ-साथ समाज सेवा का भी भरपूर अवसर मिलता है। वह कहती है कि यही वजह थी कि उन्होंने नर्सिंग की पढ़ाई की और इस सेवा में जुट गई। नसबंदी या प्रसव के दौरान घबरा रही महिलाओं को ढांढस देना। वहां उन्हें अपने परिवार के सदस्य जैसा माहौल देकर उसकी पीड़ा को कम करने का प्रयास करती है।
डेढ़ हजार प्रसव कराने में अहम भूमिका
गांव 4 एमएल के उप स्वास्थ्य केन्द्र में कार्यरत एएनएम सुमन लता करीब डेढ़ हजार प्रसव कराने में अहम भूमिका निभा चुकी है। उसकी इस गांव में तैनाती से पहले स्वास्थ्य केन्द्र में प्रसव काफी कम होते थे लेकिन उसकी नियुक्ति के बाद संस्थागत प्रसव का आंकड़ा बढ़ने लगा। वर्ष 2009 से अपने कार्य के बूते इलाके मएक जीडी, घड़साना निवासी परमजीत कौर पत्नी सोहन सिंह ने करीब 12 साल पहले ज्वाइनिंग से लेकर अब तक अपने कार्यस्थल उल्लेखनीय कार्य किया है। इसके चलते परमजीत को ब्लॉक व जिला स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है। यह महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं को समय पर चिकित्सा सुविधाओं की जरूरत होती है। वह रोगियों की चिकित्सीय देखभाल के साथ-साथ आत्मीयता से पेश आती है। वह क्षेत्र के उप स्वास्थ्य केंद्र में रोगियों को राज्य सरकार की योजनाओं से लाभान्वित करती है।
श्रीगंगानगर के अशोक नगर बी की निवासी देवीरानी पत्नी राजेन्द्र कुमार गांव फूसेवाला के राजकीय चिकित्सालय में महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता के पद पर कार्यरत हैं। करीब 29 साल पहले राजकीय सेवा में आई देवीरानी का कहना है कि उसे रोगियों की सेवा करके संतोष मिलता है। गांव वासियों की सेवा करने के बदले सम्मान और प्यार मिलता है तो बहुत अच्छा लगता है। पूरे गांव के बच्चे बुआ जी कह के पुकारते हैं तो सम्मान की अनुभूति होती है। विभाग में प्रेक्टिकल वर्क के बजाए कागजी कार्यवाही ज्यादा करनी पड़ती है। पहचान है। नया काम होने की चुनौती व स्टाफ की कमी के कारण बहुत सी कठिनाइयां सामने आई लेकिन उन्होंने इसका डटकर मुकाबला किया। सुमन टीकाकरण, प्रसव, मौसमी बीमारियों सर्वे आदि में बेहतर काम कर रही है।
विदित रहे कि रात के अंधेरे में लालटेन लेकर घायलों की सेवा करने के साथ-साथ महिलाओं को नर्सिंग की ट्रेनिंग देने वाली फ्लोरेंस नाइटेंगल ने क्रीमिया युद्ध में घायल सैनिकों के उपचार में अहम भूमिका निभाई थी। फ्लोरेंस नाइटेंगल को द्मलेडी विद द लैम्पद्य के नाम से भी जाना जाता है। नाइटेंगल तो अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके पदचिन्हों पर चलते हुए नर्सिंग की सेवा कर रहीं महिलाओं की संख्या अनगिनत है।