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पंचायती राज दिवस विशेष: सरपंच और व्यवस्था की खींचतान में उलझे गांव

पंचायती राज व्यवस्था में सरपंच को गांव का मुखिया माना जाता है,लेकिन हकीकत में वह अक्सर व्यवस्था की जटिलताओं में उलझा नजर आता है। कई सरपंचों का कहना है कि वे निर्णय लेने में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हैं। योजनाएं उच्च स्तर पर तय होती हैं, जिससे गांव की वास्तविक जरूरतें पीछे रह जाती हैं। धनराशि समय पर और सीधे पंचायतों तक नहीं पहुंचने से विकास कार्य प्रभावित होते हैं।

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तीन दशक बाद भी विकास की धारा गांव के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंची है।

श्रीगंगानगर। गांवों में विकास के लाख दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि रावलामंडी क्षेत्र के चक एक एएनएम में आज भी ग्रामीण पक्की सडक़ को तरस रहे हैं और कच्चे रास्तों पर आवागमन को मजबूर हैं।

  • कृष्ण चौहानश्रीगंगानगर.24 अप्रेल 1993 इस दिन पंचायती राज व्यवस्था के जरिए लोकतंत्र को गांवों तक सशक्त बनाने की नींव रखी गई। तीन दशक बाद भी विकास की धारा गांव के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंची है। राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस पर पड़ताल में सामने आया है कि पंचायतों के दावों और जमीनी सच्चाई के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।पंचायती राज व्यवस्था में सरपंच को गांव का मुखिया माना जाता है, लेकिन हकीकत में वह अक्सर व्यवस्था की जटिलताओं में उलझा नजर आता है। कई सरपंचों का कहना है कि वे निर्णय लेने में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हैं। योजनाएं उच्च स्तर पर तय होती हैं, जिससे गांव की वास्तविक जरूरतें पीछे रह जाती हैं। धनराशि समय पर और सीधे पंचायतों तक नहीं पहुंचने से विकास कार्य प्रभावित होते हैं। छोटे-छोटे कार्यों के लिए भी कई स्तरों से अनुमति लेनी पड़ती है, जिससे काम में अनावश्यक देरी होती है।

क्या हुआ,क्या नहीं हुआ

पेयजल (जल जीवन मिशन): दावा - हर घर नल से जल। हकीकत - कई जगह पानी का स्रोत नहीं, गर्मियों में नल सूखे रह जाते हैं।सडक़ : दावा - हर गांव मुख्य मार्ग से जुड़ा। हकीकत - पहली बारिश में सडक़ें खराब हो जाती हैं, अंदरूनी रास्ते अब भी कच्चे हैं।स्वास्थ्य सेवाएं: दावा - स्वास्थ्य केंद्र स्थापित। हकीकत - डॉक्टर और दवाइयों का अभाव, लोगों को इलाज के लिए शहर जाना पड़ता है।

धीमे इंटरनेट से अटकते ऑनलाइन काम

पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सरकार ने कई ऑनलाइन व्यवस्था शुरू की हैं, लेकिन गांवों में धीमी इंटरनेट सेवा और तकनीकी जानकारी की कमी के कारण सरपंचों को अन्य लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे कामकाज में कठिनाई के साथ गड़बड़ी की आशंका भी बनी रहती है।

सही दिशा और मजबूत इच्छाशक्ति से बदलाव संभव

हालांकि कुछ पंचायतों ने बेहतर कार्य कर उम्मीद जगाई है। महाराष्ट्र का हिवरे बाजार जल प्रबंधन के जरिए समृद्ध गांव बना है,वहीं तमिलनाडु का ओडनथुरई अपनी ऊर्जा स्वयं तैयार कर आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ा है। ये उदाहरण बताते हैं कि सही दिशा और मजबूत इच्छाशक्ति से बदलाव संभव है।

वर्जन…

पंचायती राज का उद्देश्य गांवों को आत्मनिर्भर बनाना था, लेकिन इसे पूरी तरह सफल बनाने के लिए व्यवस्था और पंचायतों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। जब तक सरपंचों को पर्याप्त अधिकार और संसाधन नहीं मिलेंगे, विकास अधूरा रहेगा।

-पवनदीप सिंह गिल, सरपंच, ग्राम पंचायत कालियां

पर्याप्त बजट मिला

गांवों में पिछले कुछ वर्षों में पर्याप्त बजट मिला है और विकास कार्यों को गति भी मिली है, लेकिन अभी भी सुधार की आवश्यकता है। सरकार की मंशा अंतिम छोर तक लाभ पहुंचाने की है।

-हरिराम चौहान,एसीईओ, जिला परिषद, श्रीगंगानगर

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