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रत्तीथेड़ी के नाम से प्रचलित था श्रीकरणपुर

इससे जुड़े एक लाउडस्पीकर के माध्यम से समाचार और अन्य मनोरंजक कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता था।

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karanpur railway station

दौरान महाराजा गंगासिंह के पौत्र व सरदूल सिंह के पुत्र करणी सिंह के नाम पर श्रीकरणपुर की स्थापना हुई।

श्रीकरणपुर.

भारत-पाक अन्तरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित श्रीकरणपुर कस्बे का नाम कभी रत्तीथेड़ी था। यह नाम 1922 में यहां आकर बसे दो परिवारों के मुखिया हाकमराम व मोहरीराम रस्सेवट ने दिया। संभवत: उन्होंने उस समय क्षेत्र में चलने वाली घनघोर आंधियों से बने रेत के ऊंचे टीलों की वजह से यह नाम दिया होगा। बाद में यहां अन्य कई परिवार आकर बसने लगे। शुरुआती दौर में यहां कच्ची बस्ती का बाहुल्य होने से इसका नाम कच्ची थेड़ी मशहूर हो गया। तत्कालीन कस्बे में पेयजल सबसे बड़ी समस्या थी। लोग बहावलपुर (पाकिस्तान) से ऊंटों पर पानी लाते थे। बाद में श्रीगंगानगर के संस्थापक महाराजा गंगासिंह के प्रयासों से 1927 में गंगनहर आने से यहां की कायापलट हुई। इस दौरान महाराजा गंगासिंह के पौत्र व सरदूल सिंह के पुत्र करणी सिंह के नाम पर श्रीकरणपुर की स्थापना हुई।

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व्यापारिक और आर्थिक दृष्टि से समृद्ध होने के कारण 1927 में ही तहसील बनी। हीरालाल शास्त्री यहां के प्रथम तहसीलदार थे। 1932 में यहां नगरपालिका का गठन हुआ। शुरुआत में यह दोनों कार्यालय गोल बाजार में हुआ करते थे। बहावलनगर (पाकिस्तान) के काश्तकार यहां जिन्स बेचने आया करते थे। यहां रेललाइन होने के कारण पंजाब और हरियाणा से भी व्यापार होने लगा। 1947 के बंटवारे के बाद पाकिस्तान से कई हिन्दू परिवार यहां आकर रहने लगे। बंटवारे के बाद यहां आए लोगों को कृषि के लिए भूमि अलॉट कर दी गई। आजादी के बाद सर्वप्रथम 1948 में कस्बावासियों ने मुंशीराम छाबड़ा को प्रथम नगरपालिकाध्यक्ष के रूप में चुना।

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शुरुआत में नगरपालिका का कार्यालय गोलबाजार में हुआ करता था बाद में वर्तमान जगह पर शिफ्ट हो गया। मनोरंजन के लिए सन 1955 में यहां एक रेडियो घर बना। जानकारी अनुसार इस रेडियो घर में बड़े आकार का एक रेडियो रखा रहता था। इससे जुड़े एक लाउडस्पीकर के माध्यम से समाचार और अन्य मनोरंजक कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता था। इन्हें सुनने के लिए लोग पालिका प्रांगण में एकत्र होते थे। पालिका प्रांगण में स्थित जीर्ण शीर्ण रेडियो केन्द्र और भंडारगृह में पड़ा पुराना रेडियो आज भी अतीत की गवाही दे रहा है। स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए वर्ष 1955 में यहां वार्ड एक में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र खोला गया।

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प्रथम प्रभारी डॉ. जेएस दत्ता ने लम्बे समय तक यहां अपनी सेवाएं दी। पंचायतीराज की स्थापना के बाद 1959 में यहां पंचायत के पहले चुनाव हुए। जिसमें तेजा सिंह प्रथम प्रधान व देवदत्त शर्मा प्रथम विकास अधिकारी बने। वर्तमान में 35 ग्राम पंचायतों में 237 गांव हैं। इसी प्रकार 26 अगस्त 1961 को यहां एसडीएम कार्यालय की स्थापना हुई। प्रथम एसडीएम के रूप में यहां सीएल जैन की नियुक्ति हुई। 1963 में यहां एसीजेएम व 1983 में एडीजे अदालत शुरू हुई।

विकास के बढ़ते क्रम में यहां सन् 2000 में यहां बीईईओ कार्यालय की स्थापना हुई जिसमें भूराराम वर्मा को बीईईओ नियुक्त किया गया। इसी प्रकार 1984 में अरोड़वंश सनातन धर्म मंदिर समिति, 1985 में श्रीशिव दुर्गा संकीर्तन मंडल, 1992 में मानव सेवा समिति, 2007 में भारत विकास परिषद, गोशाला सहित आदि समाज सेवी संगठन सक्रिय हुए जिन्होंने कस्बे के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान किया।