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इक बंजारा गाए ……… नेकी कर और..

एक चर्चित मुहावरा है, नेकी कर दरिया में डाल। इसका अर्थ होता है, भला करो और भूल जाओ। श्रीगंगानगर में संदर्भ में इस मुहावरे के मायने बदल जाते हैं।

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इक बंजारा गाए ......... नेकी कर और..

इक बंजारा गाए ......... नेकी कर और..

एक चर्चित मुहावरा है, नेकी कर दरिया में डाल। इसका अर्थ होता है, भला करो और भूल जाओ। श्रीगंगानगर में संदर्भ में इस मुहावरे के मायने बदल जाते हैं। अगर इस मुहावरे को नेकी कर चौराहे पर टांग कर दिया जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। वैसे तो मदद व दान दो तरह के होते हैं। कोई श्रेय ले लेता है तो कोई यह काम बिना किसी शोर शराबे के चुपचाप ही कर देता है,

लेकिन शहर में श्रेय लेने वालों की संख्या ज्यादा है। बात श्रेय तक ही सीमित नहीं है। श्रेय के लिए बाकायदा चौक-चौराहों पर होर्डिंग्स तक लगा दिए जाते हैं। कई होर्डिंग्स तो समय से पहले ही लगा दिए जाते हैं तो कई समय बीतने के बाद भी टंगे रहते हैं। लिहाजा, इस तरह श्रेय लेने वालों के लिए नेकी कर दरिया में डाल वाला मुहावरा, नेकी कर चौराहे पर टांग ज्यादा मुफीद लगता है।


दिलचस्पी का राज


राजनीति में कई तरह के अर्थ निकाले जाते हैं। मसलन, कोई दूरी बनाकर रखता है तो इसके मायने अलग माने जाते हैं। कोई नजदीकियां बढ़ाता हैं तो इसको कुछ और समझा जाता है। और कोई किसी स्थान विशेष को लेकर दिलचस्पी दिखाने लगे तो भी राजनीतिक गलियारों में इसका मतलब निकाल लिया जाता है। अब एक केन्द्रीय मंत्री का श्रीगंगानगर जिले के प्रति मोह कुछ ज्यादा ही दिखाई दे रहा है। उनके उस मोह से उनके समकक्ष के नेताओं के दिलों पर सांप लोटना भी स्वाभाविक है। बताया जाता है कि एक कार्यक्रम के बहाने मंत्री जी ने श्रीगंगानगर की नब्ज टटोलने का प्रयास भर किया लेकिन उनके प्रतिस्पर्धियों को यह भी नागवार गुजरा। चर्चा तो यह भी है मंत्री के कार्यक्रम में भीड़ ज्यादा न जुटे इसलिए भी प्रतिस्पर्धियों ने अपने स्तर पर प्रयास भी किए लेकिन बात बनी नहीं।


शक्ति प्रदर्शन
राजनीति से जुड़े तथा प्रचार-प्रसार की चाह वाले लोग गाहे-बगाहे शक्ति प्रदर्शनों से नहीं चूकते। भले ही शक्ति प्रदर्शन वे अपने समर्थकों से करवाएं या खुद करें यह कोई मायने नहीं रखता। श्रीगंगानगर में इस तरह के प्रदर्शनों की फेहरिस्त बेहद लंबी है। अब रामलीला व दशहरे को ही ले लीजिए। खुद को इक्कीस साबित करने के लिए दो धड़ों ने किस-किस तरह के उपक्रम किए, समूचा शहर जानता है।

अब जो किया सो किया लेकिन उन उपक्रमों के निशान अब भी दिखाई दे रहे हैं। दशहरे व रामलीला के बड़े-बड़े होर्डिंग्स त्योहार गुजरने के बाद भी टंगे हुए हैं। भले ही इनकी अब प्रासंगिकता नहीं रही हो लेकिन इस बहाने प्रचार तो हो ही रहा है। अब बैठे बैठाए फ्री में प्रचार हो तो भला इन होर्डिंग्स को क्यों हटवाएंगे। यह तो विभाग ही जाने कि वह किस कीमत पर इस बदरंगता को सहन कर रहा है।


सांप-सीढ़ी का खेल
सांप सीढ़ी का खेल बड़ा ही रोचक होता है। जब सीढ़ी पर गोटी आती है तो खेलने वाला जंप कर जाता है जबकि सांप के मुंह पर आने पर वह झट से वापस नीचे लौट जाता है। राजनीति भी एक तरह से सांप-सीढी का ही गेम माना जाता है। श्रीगंगानगर में नगरपरिषद व नगर विकास न्यास के मुखियाओं के बीच भी कुछ इसी तरह का गेम चल रहा है। दोनों ही मुखियाओं में खुद को इक्कीस साबित करने की होड़ सी लगती है। दोनों में से कोई भी किसी तरह का मौका नहीं चूकना चाहता। फिलहाल तो दोनों ही मुखिया इन दिनों शहर की सड़कों को लेकर चर्चा में है। कोई बयान दे रहा है तो कोई चिठ्ठी लिखकर जवाब मांग रहा है। वैसे दोनों के इस खेल से अब तक जनता का भला कम ही हुआ है। कई जगह टूटी सड़़कों पर लोग आज भी हिचकोले खा रहे हैं।