
पर्यावरण को शुद्ध रखने वाली वनस्पतियां,आजीविका की भेंट लगी चढ़ने
- इनमें अनेक प्रकार के जीव जन्तु भी रहते थे व पर्यावरण भी शुद्ध था. परन्तु विभागीय ऊदासीनता के चलते यहां के लोगों ने इन वनस्पतियों को आजीविका का साधन मान लिया
रामसिंहपुर. मानव जीवन के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण व पर्यावरण को शुद्ध रखने वाली वनस्पतियां विभाग की ऊदासीनता के चलते मानव आजीविका की भेंट चढ़ रही है. जिससे दिनों दिन पर्यावरण अशुद्ध होता जा रहा है. परन्तु विभागीय उच्चाधिकारी गहरी नींद में सो रहे है.
जानकारी के अनुसार सूरतगढ व श्री विजयनगर पंचायत समितियों कि ग्राम पंचायत गोपालसर, गोविन्दसर, बख्तावरपुरा, एक एलएम, गोमावाली, कूंपली व दस एएस आदि में वन विभाग व राज रकबा खाली पड़ा है. जिसमें दो दशक पहले फोग, खींप, लाणा, बुई व कंटीली झाड़ीयों कि भरमार होती थी. जिससे इनमें अनेक प्रकार के जीव जन्तु भी रहते थे व पर्यावरण भी शुद्ध था. परन्तु विभागीय ऊदासीनता के चलते यहां के लोगों ने इन वनस्पतियों को आजीविका का साधन मान लिया व इनको जड़ो सहित उखाड़कर इनकी लकड़ियां बाजार में अंगीठी, चूल्हा व ईंट भट्टें की भेंट चढ गई. जिससे आज इस क्षेत्र में धरती बंजर होकर रेत उड़ रही है.
-यहां से उखाड़ी जा रही है वनस्पतियां
क्षेत्र की सूरतगढ व श्री विजयनगर पंचायत समितियों के गांव गोपालसर, हिंजरासर, राजाण, 5सीएम, गोमावाली, धाधड़ा, 7 जीडीएम, भाणसर, 5 जीएम,तख्तपुरा, भागसर, अर्जुनोतपुरा, 17 जीएम, 8एसजेएम व 11 एएस आदि क्षेत्र में वन विभाग व खाली पड़े राज रकबा में से फोग, खिंप, लाणा व कंटीली झाड़ीयों को जड़ों सहित उखाड़ कर इनकी लकड़ीयों को ऊंटगाड़ो व ट्रैक्टर ट्रॉलियों में भरकर बाजार में 350 से 450 रू. क्विंटल के दामों से बेचा जा रहा है. जिससे यह भूमि बंजर होती जा रही है. लेकिन विभागीय उच्चाधिकारीयों को इससे कोई लेना देना नहीं है.
-वनस्पति बनी आजीविका का साधन
इस क्षेत्र में मजदूरी करने वाले लोगों को खेतों व अन्य स्थानों पर काम नहीं मिलने पर यह खाली समय में वन विभाग व खाली पड़े राज रकबे से फोग, खींप, लाणा व कंटीली झाड़ियों को जड़ो सहित ही उखाड़ कर इन लकड़ियों को नजदीकी बाजार में चूल्हों व अंगीठी वालों को बेच देते है. एक लकड़हारे ने बताया कि खाली समय में ताश खेलने कि बजाए लकड़ी उखाड़ने के धंधे में लगे रहते है. जिससे दो आदमी दो दिनों में एक गाडा लकड़ी कर लेते है. जो करीब पांच से छह क्विटल तक हो जाती है व बाजार में 350 से 450 रूपयों तक बिक जाने से घर का खर्चा निकल जाता है. परन्तु दूसरी ओर विभाग को इसके बारे में जानकारी तक ही नहीं होने से धरती बंजर हो रही है. जो पर्यावरण के लिए काफी हद तक नुक़सानदायक है.
-मेरे को इसके बारे में जानकारी नहीं है अगर ऐसा हो रहा है तो तुरन्त कार्रवाई की जाएगी...............................-शंकरलाल स्वामी; रेंजर वन विभाग बिरधवाल
Published on:
03 Apr 2019 02:25 pm
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