
तालाब पर इमारतें बन जाने से हाईकोर्ट खफा, दो हप्ते में तालाब को मूलस्वरूप में लाने का डीएम को दिया आदेश
सुलतानपुर. हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद भी शहर में ऑन रिकॉर्ड मौजूद तालाबों पर अवैध कब्जा कर बड़ी -बड़ी इमारतें बन गईं और तालाबों को जुबानी बेंचकर क्षेत्रीय लेखपाल करोड़ों रुपए के मालिक बन गए लेकिन, शहर में स्थित तालाबों को पाटकर उसका स्वरूप बदलकर लेखपाल से लेकर एसडीएम तक को हमवार करके तालाबों पर भवन बनाने वालों की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं, क्योंकि शहर के बीचों बीच शास्त्रीनगर मुहल्ले में स्थित 18 बीघे रकवे वाले तालाब को तहसीली प्रशासन के सहयोग से उसका स्वरूप बदलकर उस पर बड़ी-बड़ी इमारतें बन जाने के मामले को लेकर दायर जनहित याचिका पर हाईकोर्ट सख्त हो गया है।
दो हप्ते में तालाब को कराएं अतिक्रमण मुक्त
शहर के मोहल्ला शास्त्रीनगर (दरियापुर ) स्थित गाटा संख्या 395/2, 551, 38, 94, 588/1 का 1.752 हेक्टेयर रकवा तालाब के रूप में राजस्व रिकार्ड में दर्ज है। यह तालाब शहर के पाश इलाके शास्त्रीनगर पुलिस चौकी के सामने स्थित है। इस 18 बीघे क्षेत्रफल वाले तालाब को पाटकर उसका स्वरूप बदलकर लेखपाल और अन्य राजस्व अधिकारियों के सहयोग से लोगों ने बड़ी बड़ी इमारतें बना लीं। तालाब का अस्तित्व खत्म हो जाने के बाद भी राजस्व विभाग कोर्ट को तालाब अतिक्रमण मुक्त होने की फर्जी रिपोर्ट देता रहा।
तालाब के अस्तित्व को 1952 के पहले की स्थिति में लाने, यानी तालाब को उसके मूल स्वरूप में लाने के लिए अधिवक्ता अनिल कुमार पांडेय ने न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की। इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने डीएम सुल्तानपुर को दो हप्ते में जांच कर तालाब के मूल स्वरूप को बहाल करने का आदेश दिया है। हाई कोर्ट के इस आदेश से लोगों में अफरा तफरी मच गई।
शीर्ष अदालत का यह है आदेश
वन, तालाब, निजी घाट, जलस्रोत, रास्ता तथा आवादी स्थल प्रकृति की देन है। वे मानव जीवन के नाजुक परिस्थितियों में संतुलन बनाए रखते हैं। उचित एवं स्वस्थ वातावरण में इन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है। ये लोगों को गुणवत्तापूर्ण जीवन का आनन्द लेने में सक्षम बनाता है। संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत यह गारंटीयुक्त अधिकार का सार है। तालाबों को मिटाने व वातावरण को दूषित करने के लिए उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2001 में प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को आदेश दिया था कि प्रकृति प्रदत्त इन तालाबों को 1951-1952 की स्थिति में बरकरार माना जाए।
प्रशासन इस आदेश का गुणवत्तापूर्ण पालन नहीं कर रहा है। समाज की इन बहुमूल्य धरोहरों से जल संरक्षण, पशुओं के चारे तथा पेयजल समस्या को जहां दूर करेगी वहीं भू-सन्तुलन बनाए रखने तथा पर्यावरण की रक्षा करने में मदद करेगा।
Updated on:
21 Nov 2019 03:30 pm
Published on:
21 Nov 2019 02:26 pm
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