
प्रजापति ने बताया कि हमारे बनाए हुए बर्तन, दीये और खिलौने महज कुछ मुहूर्त या टोटके तक सीमित हो गए हैं।
राम सुमिरन मिश्र
सुलतानपुर. आधुनिकता के इस दौर में मिट्टी के दीये और मिट्टी के बर्तनों का चलन बिल्कुल कम हो गया है। कुछ साल पहले तक शादी-विवाह, कार्यक्रम, भोज, मुंडन संस्कार या कोई अन्य कार्य होने पर मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग किया जाता था, विशेषकर कुल्हड़ों का प्रयोग ज्यादा होता था। लेकिन, अब दावतों में विशेषकर ग्रामीण इलाकों में देशी कुल्हड़ों का प्रयोग लगभग बंद सा हो गया है। ऐसे में कुम्हारी कला के माहिर कुम्हारों की मिट्टी के बर्तन बनाने की कला फीकी पड़ती जा रही है। देखा जाये तो अब अधिक उम्र वाले बूढ़े बुजुर्ग ही चाक और आवां से जुड़े हैं। युवक इस पुश्तैनी व्यवसाय से एकदम कट गये हैं। वह रोजी रोटी के लिए अन्य व्यवसाय की ओर हाथपांव मार रहा है।
कुम्हार, कसगर मिट्टी के बर्तन बनाकर अपना और अपने परिवार का पेट पालते थे। आज के दौर में मिट्टी के बर्तन, दीये, जटोला और मिट्टी के खिलौनों की मांग कम हो गई है। कुम्हारी कला से जुड़े लोग कहते हैं कि चाक के सहारे परिवार का गुजारा करना बहुत मुश्किल साबित हो रहा है।
'सरकार ने किया विश्वासघात'
शहर के कुम्हारन टोला के साधू प्रजापति कहते हैं कि आधुनिकता के दौर में मिट्टी के बर्तन की मांग तो कम हो ही गई है, सबसे ज्यादा नुकसान सरकारों ने किया है। सरकार हम लोगों के साथ विश्वासघात करती है, वादा खिलाफी करती है। वह कहते हैं कि सरकार ने कहा था कि कुम्हारों को मिट्टी के लिए पट्टे पर जमीन दी जायेगी, लेकिन आज तक किसी को भी जमीन नहीं मिली। हम लोगों को मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए बाहर से मिट्टी लानी पड़ती है, जो 2500 रुपये प्रति ट्राली और ऊपर से पुलिस भी परेशान करती है। अवैध खनन के नाम पर पैसा वसूल करती है। प्रजापति ने बताया कि हमारे बनाए हुए बर्तन, दीये और खिलौने महज कुछ मुहूर्त या टोटके तक सीमित हो गए हैं।
मिट्टी से बनते हैं ये बर्तन
गांव की मिट्टी से करवा, तोता, परई, कुल्हड़ ,कोसा, मोटर, गुल्लक, गगरी, सुराही, हांडी, लोटा, घड़ा, कलश, दीप, जटोला, तराजू, कुंडा, घण्टी, कछरी और डोकिया आदि बहुत से बर्तन बनते हैं।
Published on:
11 Nov 2020 06:07 pm
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