
सुल्तानपुर. जिला मुख्यालय से करीब 11 किमी दक्षिण-पूर्व की दिशा में ग्राम लोदीपुर में स्थित अष्टभुजा भवानी का करीब 5 सौ साल पुराना मन्दिर है । जहां स्थापित भवानी अष्टभुजा अपने पुजारी जो यहां से करीब तीन किमी दूर भरथीपुर गांव निवासी पण्डित देवीदीन गोस्वामी से सीधी बात करती थीं । बताते हैं कि गांव वालों पर जब कोई दैवीय आपदा आने वाली होती थी तो मां भवानी पुजारी जी को बता देती थीं । किवदंतियों के अनुसार एक बार मां भवानी ने पुजारी गोस्वामी को बताया कि तेरा दूसरे बालक की कल सांप काटने से मौत हो जाएगी । भवानी की यह बात पुजारी के गले नहीं उतरी लेकिन दूसरे दिन भवानी की कही बात सच साबित हुई । यह बात बहुत दूर दूर तक फैल गई । लोगों का मनौती के लिए मेला लगने लगा ।
अष्टभुजा भवानी के पुजारी रहे पण्डित देवीदीन गोस्वामी की मृत्यु के बाद बहुत दिनों तक यहां कोई पुजारी नही रहा । बहुत दिनों बाद गुमनाम बाबा जंजीरा दास इस स्थान पर आए । बाबा जंजीरा दास के बारे में बताया जाता है कि उनका असली नाम स्वामी पुरुषोत्तम दास महाराज उदासीन था । उनका मूल स्थान गाजीपुर जिले के दिलदार नगर रेलवे स्टेशन के पूरब 500 मीटर की दूरी पर माई जी की कुटी पर जंजीरा बाबा का स्थान है । माई जी के शिष्य परमेश्वर दास थे । बताते हैं कि माई जी के आदेश पर ही जंजीरा बाबा को अपना शिष्य बनाया था । पन्द्रह साल की आयु में ही बाबा जंजीरा दास ने घर छोड़कर गुरु महाराज की शरण में आ गए थे । गुरु दीक्षा लेने के बाद वे देशाटन पर निकल गए थे । देशाटन करते करते बाबा जंजीरा दास सुल्तानपुर जिले में पखरौली गांव में वर्ष 1944 में पहुंचे थे । उस समय उनके साथ उनका एक भक्त भी था । वे रेलवे लाइन के किनारे लालू का पूरा गांव के पश्चिम कुटिया बनाकर रहने लगे ।
बताते हैं कि यहां 4 साल रहने के बाद 1948 में लोहरामऊ गांव में सगरा के किनारे कुटिया बनाकर रहने लगे थे लेकिन " रमता योगी बहता पानी " की तर्ज पर सन 1949 में लोदीपुर गांव के दक्षिण उसी स्थान पर पहुंचे, जहां अष्टभुजा देवी का 800 सौ साल पुराना मन्दिर था । बताते हैं कि पहले वह मन्दिर टीले के रूप में था । एकांत स्थान होने के कारण उसी टीले के बगल कुटिया बनाकर रहने लगे । बताते हैं बाबा एक महीना 21 दिन तक केवल पानी पीकर रहे । इसके बाद एक वर्ष तक चावल का मांड पीकर रहे । बाबा जंजीरा दास वहां कई सालों तक कठोर तपस्या की । कमर में पीतल की जंजीर बांधते थे इसलिए उन्हें जंजीरा बाबा कहा जाने लगा । घूमते घूमते बाबा प्रतापगढ़ जिले के जगेसर गंज रेलवे स्टेशन के निकट बांसी गांव में एक शिष्य के यहां 30 अगस्त 1980 को सुबह 10 बजे खांसी आयी और वे ब्रह्मलीन हो गए । बाबा का अंतिम संस्कार उनके शिष्य बाबा हनुमान दास ने किया । पद्मासन की मुद्रा में बाबा को समाधि दी गई ।
समाधि स्थल से 50 फुट की दूरी पर अष्टभुजा देवी का वह मन्दिर है । बताया जाता है कि अष्टभुजा भवानी की मूर्ति की स्थापना भदैया स्टेट के राजा लाल साहब सिंह ने कराया था । भदैया के राजा ने पुजारी को 5 बीघे जमीन दान किया था । मन्दिर के बगल दक्षिण दिशा में 2 सौ साल पुराना पीपल का पेड़ है । बाबा जंजीरा दास के परम शिष्य बाल ब्रह्मचारी हनुमान दास हैं, जो मन्दिर पुजारी हैं । अष्टभुजा मन्दिर पर कार्तिक मास की एकादशी, द्वादशी तथा तेरस के दिन तीन दिन तक भंडारा चलता है । भंडारे में हजारों सन्त - महात्मा एवं हजारों दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है। लोग प्रसाद ग्रहण कर मनौती मागते हैं। मनौती पूर्ण होने पर लोग दर्शन करने फिर आते हैं ।
पुजारी जी ने कहा मन्दिर की महिमा का न करो प्रचार
मन्दिर के सन्त बाबा हनुमान दास जी ने कहा कि इस मंदिर और इस स्थान का प्रचार मत करिए । उन्होंने कुछ भी बोलने से, फोटो खींचने से मना किया । उन्होंने कहा कि हम उदासीन अखाड़े के सन्त हैं । हम इस दुनियादारी से दूर रहते हैं ।
Published on:
07 May 2018 11:18 am
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