
वृद्धाश्रमों में मां की सूनी आंखों में है अनकही कहानियां
प्रदीप जोशी
सूरत. पिपलोदके एक वृद्धाश्रम के गलियारे में शाम की धुंधली रोशनी के बीच 70 साल की अम्मा वॉकर के साथ प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठी मिलीं। कम सुनाई देता था, लेकिन पूरे जतन से बात की। कुसुम देवी (नाम बदला है) के इकलौते बेटे के अडाजन में खुद के दो ऑफिस और पांच कमरों का महंगा फ्लैट है। चाहता तो मां को एक कमरा दे सकता था। मां तो मां होती है, बेटे के छोड़ देने के बाद भी कुल को लजाना नहीं चाहती थी तो मां कह रही थी कि- वो तो अच्छा है, बस थोड़ा पत्नी के साथ खुशी से रहे, इसलिए यहां आना पड़ा। अपने नाम की प्रॉपर्टी व गहने क्यों दे दिए, पूछने पर मां ने कहा- मेरा जीवन कितना बचा? उसकी पूरी जिंदगी बाकी है। इकलौता है तो दे दिए। पत्रिका ने पूछा- घर जाना चाहोगे, तो बोली मोहभंग हो गया अब। दो पोतों की याद आने पर वे बतातीं है कि बेटा केवल मोबाइल में फोटो दिखा देता है, पोती मिलने के लिए रोती है। कुसुम देवी के पति वकील थे।
दूसरी मां गायत्री देवी के दो बेटे विदेश में बसने के लिए मां को यहां छोड़ गए थे। वृद्धाश्रम से मिली जानकारी के मुताबिक, कोरोना काल में चार मामले ऐसे थे जिनमें माताओं की मौत के बाद बेटों ने कह दिया अंतिम संस्कार वृद्धाश्रम वाले ही कर दें, खर्चा दे दिया जाएगा।
अगले जनम मोहे बिटिया ही दिजौ...
कुछ वृद्धाश्रमों से मिले महत्वपूर्ण तथ्य के मुताबिक, सौ में से सत्तर मामलों में वृद्धाश्रमों में माता-पिता का खर्च बेटियां उठा रही है और नियमित मिलने और फोन से हालचाल पूछने में भी बेटियां ही आगे है।
Updated on:
14 May 2023 02:04 pm
Published on:
14 May 2023 02:02 pm
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