
SURAT SPECIAL NEWS: चंद्रयान मिशन में तापी में बचपन गुजारने वाले प्रोफेसर संतोष वडवले भी शामिल
बारडोली. अंतरिक्ष अनुसंधान के इतिहास में भारत का नाम विश्व में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया। चंद्रयान-3 ने पहली बार चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक लैंडिंग की और भारत की ताकत का सबूत दिया। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत के वैज्ञानिकों और इसरो टीम को दुनियाभर से दाद मिल रही है। इस मिशन में तापी जिले में बचपन गुजारने वाले वैज्ञानिक प्रोफेसर संतोष वडवले भी शामिल है। वडवले के साथ तापी जिला सूचना विभाग ने टेलीफोन पर बातचीत की। इसमें बताया कि तापी जिले की वालोड तहसील में वेडछी स्थित गांधी विद्यापीठ के सेवानिवृत्त प्रोफेसर वसंत वडवले ने वेडछी को ही अपनी कर्मभूमि बनाया था। सेवानिवृत्ति के बाद अहमदाबाद में बस गए। उनके पुत्र संतोष जो डॉ. विक्रम साराभाई स्थापित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला 2005 से जुड़े है। वर्तमान में वह मिशन चंद्रयान-3 के रोवर के प्रधान अन्वेषक के रूप में कार्यरत हैं। प्रोफेसर संतोष वडवले ने 8वीं कक्षा तक की पढ़ाई स्वराज आश्रम वेडछी से की और बाद में 10वीं बोर्ड की परीक्षा देकर 11वीं, 12वीं एलेम्बिक विद्यालय, वडोदरा से उत्तीर्ण की और एमएस यूनिवर्सिटी, वडोदरा से बीएससी/एमएससी की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने देश के मशहूर संस्थान टीआईएफआर मुंबई से पीएचडी की। इसके बाद उन्होंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के सीएफए सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स से दो साल की पोस्ट डॉक्टरेट की। उन्होंने अमेरिका के नासा समेत दुनिया के कई देशों में स्पेस एक्स रे प्रोजेक्ट पर काम किया है। एक बहुत ही सहज स्वभाव के प्रोफेसर संतोषभाई ने मिशन प्रयोगों का संचालन किया है और कई देशों में मार्गदर्शक और सलाहकार के रूप में काम किया है। वह अपनी सफलता का श्रेय केवल खगोल भौतिकी को नहीं बल्कि अपने प्यार, जुनून और कड़ी मेहनत को देते हैं। बातचीत में जीवनसंगिनी नीलमबेन के बारे में डॉ. वडवले ने बताया कि वे परिवार की ज़िम्मेदारियां धैर्यपूर्वक संभाल रही है।
- मुख्य विषय खगोल भौतिकी :
24 अगस्त को रात 10 बजे चंद्रयान-3 मिशन के दौरान प्रोफेसर संतोषभाई ने बेहद दिलचस्प जानकारी दी और कहा कि हाल ही में रोवर को कमांड भेजे गए है। 14 दिन तक सूरज की रोशनी रहती है, इसलिए बैटरी को सोलर से चार्ज करके तैयार रखना होगा और हर पल का उपयोग वातावरण को ध्यान में रखते हुए करना होगा। मेरा मुख्य विषय खगोल भौतिकी है और उनकी विशेषज्ञता एक्स रे खगोल विज्ञान में है। जिसमें एक्स रे तरंग की मदद से विदेशी वस्तुओं यानि तारे और कॉस्मिक कोड, न्यूट्रॉन स्टार, ब्लैक होल, पल्सर आदि का अध्ययन करना होता है। उनका शोध आकाशगंगा के बाहर भी जारी है। इसके अलावा एक्स रे खगोल विज्ञान के लिए उपकरण विकसित करना, दूरबीनें डिजाइन करना उनका काम है। नासा में केवल मिशन एक्स-रे में काम किया। 20 साल पहले जब प्रोफेसर संतोषभाई अमेरिका से लौटे तो वे चंद्रयान-1 और एस्ट्रोसैटदोनों मिशनों से जुड़े हुए थे। चंद्रयान-1 में उनका एक प्रयोग पेलोड था। और चंद्रयान-2 पर अभी भी शोध चल रहा था. जिसे साल 2019 में लॉन्च किया गया था, हालांकि हम चंद्रयान-2 की लैंडिंग में सफल नहीं हुए, लेकिन ऑर्बिटर पूरी तरह से सफल है।
- अगला मिशन आदित्य-एल 1 होगा :
उन्होंने बताया कि चंद्रयान-3 बहुत अच्छे से काम कर रहा है। रोवर दृढ़ संकल्प के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। हम चंद्रमा की सतह पर छोटे-बड़े गड्ढों और छायाओं पर लगातार नजर रखेंगे और हर पांच मीटर पर रोवर खड़ा रहेगा। सीएच-2 की शुरुआत 2009-10 में रूस के साथ एक संयुक्त परियोजना के रूप में की गई थी। ऑर्बिटर/रोवर का निर्माण हमें (इसरो) ही करना था। लैंडर रूस का था, लेकिन 2011 में एक रूसी मिशन की विफलता के कारण हमने (इसरो) एक पूर्ण मिशन बनाने का फैसला किया। प्रोफेसर संतोषभाई का उपकरण एपीएक्सएस पेलोड चंद्रमा की सतह पर तत्वों के बारे में जानकारी प्राप्त करेगा। प्रोफेसर वडवले और उनकी टीम वहां की तस्वीर, सतह का तापमान और तात्विक डेटा प्राप्त कर शोध करेगी। अब हम अपनी तकनीक के इस्तेमाल से पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गए हैं। अब अगला मिशन आदित्य-एल1 होगा और अगले 3/4 महीनों में एक्स पो सैट लॉन्च किया जाएगा।
Published on:
26 Aug 2023 09:36 pm

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