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SURAT TIPPNI: नया कदम बदलाव की ओर…

व्यापार का एक चर्चित सिद्धांत है। आज नगद, कल उधार...।

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SURAT VIDEO: लेबर-ट्रांसपोर्ट संगठन निर्णय पर कायम

SURAT VIDEO: लेबर-ट्रांसपोर्ट संगठन निर्णय पर कायम

सूरत. व्यापार का एक चर्चित सिद्धांत है। आज नगद, कल उधार...। इस सिद्धांत में नगद के लिए तो आज आता है, लेकिन उधार के लिए कल का दिन कभी नहीं आता। इस व्यापारिक सिद्धांत से देश की कई छोटी-बड़ी मंडियों में आज भी व्यापार होता है। अब बात करते हैं एशिया की सबसे बड़ी कपड़ा मंडी सूरत की। यहां यह व्यापारिक सिद्धांत सालाना करोड़ों-अरबों रुपए के कपड़ा कारोबार में लागू नहीं होता। उसी का नतीजा रहता है, प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए की डूबत सूरत कपड़ा मंडी को झेलनी पड़ती है। सूरत का टैक्सटाइल सेक्टर टैक्स, आयात-निर्यात व जीडीपी के रूप में देश की अर्थव्यवस्था पर भी असर डालता है। इस बड़े आर्थिक नुकसान से मंडी को बचाने के लिए प्रयास तो पहले भी बहुत हुए, मगर उन प्रयासों में आत्मविश्वास, दृढ़-निश्चय और व्यापारिक ईमानदारी का अभाव रहता था। नतीजन नौ दिन चले अढ़ाई कोस...के समान प्रयास हर बार असफल होते रहे।

टैक्सटाइल सेक्टर में प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए की खोट से बचाने के लिए नेता, मंत्री व लोकल व्यापारी नेताओं के भाषण, वादे, व्यापारिक संगठनों व पुलिस की बैठकों में चर्चा के दौर तो सब खूब चले, मगर बदलाव कुछ भी नहीं। आए दिन देश की कपड़ा मंडियों व व्यापारियों के बीच लेन-देन में फ्रॉड की खबरों से अखबार भरे होते हैं। करोड़ों का जीएसटी वसूल कर अपनी पीठ थपथपाकर उपलिब्ध बताने वाली सरकार की तरफ से भी टैक्सटाइल सेक्टर के हजारों पीडि़त व्यापारियों के लिए कोई कदम नहीं उठाए जाते हैं। पुलिस थाने तो मानों व्यापारी की शिकायत पर तोड़बाजी के केंद्र बनते रहे हैं।ऐसे में जरूरत थी कि देश की अन्य बड़ी कपड़ा मंडियों को सांगठनिक स्तर पर जोड़ने की। इनमें अहमदाबाद के व्यापारिक संगठन सीमाडा, मुंबई के हिन्दुस्तान चेम्बर ऑफ कॉमर्स, बेंगलुरू के कर्नाटका होजरी एंड गारमेंट एसोसिएशन व द बेंगलुरू हॉलसेल क्लॉथ मर्चेंट्स एसोसिएशन के अलावा कोलकाता व पटना कपड़ा मंडियों को प्राथमिक स्तर पर जोड़ने की कोशिश भी की जानी थी। पिछले दिनों इसको लेकर व्यापारी बड़े संगठन की तरफ उम्मीद की नजरों से देख रहे थे, जिसको सरकार का साथ मिले। ऐसे में फैडरेशन ऑफ सूरत टेक्सटाइल ट्रेडर्स एसोसिएशन (फोस्टा), जो एक दौर में सरकार तक अपनी बात पहुंचाने का ठोस जरिया था, लेकिन वह संगठन मृतप्राय हो चुका था। अब व्यापारियों के साथ पत्रिका की मुहिम से 11 वर्ष बाद चुनाव हुए और नए सिरे से फोस्टा का गठन हुआ है। राहत की बात यह है कि नई फोस्टा ने अब इस दिशा में कुछ प्रयास शुरू किए हैंं। इन प्रयासों में देश की छोटी-बड़ी कपड़ा मंडियों के साथ जुड़कर सूरत कपड़ा मंडी का कारोबार व्यापारिक शर्तों के साथ आगे बढ़ाया जाएगा। इससे नुकसान कम होने के आसार बढ़ेंगे। साथ ही मंडियों के व्यापारियों के बीच बेहतर तालमेल हाेगा। यह बदलाव सूरत कपड़ा मंडी में नई उम्मीद लेकर आ सकता है। अब देखना यह है कि नया संगठन भी दावे-वादों के बीच कितनी कर्मठता व ईमानदारी के साथ व्यापारियों को मंदी, धोखाधड़ी व गुड्स रिटर्न जैसी समस्याओं से उबार सकता है?

dinesh.bhardwaj@in.patrika.com