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मां कामाख्या का अंबूबाची महोत्सव शुरु, होती है देवी के इस भाग की पूजा

विश्व के 51 शक्तिपीठों में सबसे महत्वपूर्ण मां कामाख्या पीठ को माना जाता है

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Sunil Sharma

Jun 23, 2016

ma kamakhya

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विश्व के 51 शक्तिपीठों में सबसे महत्वपूर्ण मां कामाख्या पीठ को माना जाता है। नीलांचल पर्वत पर विराजमान मां कामाख्या की पूरे विश्व के तांत्रिकों में विशेष मान्यता है। माना जाता है कि यहां पर देवी प्रतिमा को भी मासिक धर्म होता है। इस देवी का मासिक धर्म सामान्य तौर पर आषाढ़ माह के सातवें दिन से शुरू होता है। इस साल के हिंदू पंचांग के अनुसार देवी का मासिक धर्म 22 जून को शुरू हो गया है। इसी दौरान यहां अंबुबाची महोत्सव की शुरूआत भी हो गई है।

चार दिन मंदिर का दरवाजा रहेगा बंद, नहीं होगी पूजा
असम के कामाख्या मंदिर में देश-विदेश से हजारों की संख्या में श्रद्धालु वार्षिक अंबुबाची मेले में हिस्सा लेने बुधवार को उमड़ पड़े। मंदिर प्रशासन ने देवी के वार्षिक मासिक धर्म अवधि के लिए उन्हें एकांत देने के लिए बुधवार सुबह से ही गर्भ गृह का दरवाजा बंद कर दिया। मंदिर रविवार सुबह फिर से खुल जाएगा और उसके बाद हजारों श्रद्धालुओं को मंदिर में जाकर देवी के दर्शन-पूजन करने की अनुमति दी जाएगी। पुजारियों के अनुसार इस अवधि के दौरान स्थानीय हिंदू पूजा नहीं करते और किसान अपने खेत नहीं जोतते।

मंदिर प्रबंधन ने बताया कि मंदिर का दरवाजा मेले के पांचवें दिन खोला जाएगा। इसके साथ ही स्थानीय अधिकारी भी मंदिर प्रांगण को स्वच्छ रखने तथा यहां आने वाला श्रद्धालुओं की आव-भगत के लिए तैयारी हैं। सीएम सर्वानंद सोनोवाल ने कहा ' भीड़ के बावजूद मंदिर का परिसर साफ और स्वच्छ बना रहे, इसके लिए हमने स्वच्छता अधिकारियों को काम सौंपा है।

शिव-पार्वती के विवाह से जुड़ी है मां कामाख्या की कथा
मां कामाख्या का संबंध मां पार्वती के दक्ष के हवन कुंड में दहन होने की घटना से हैं। माना जाता है कि जब पार्वती ने अपने शरीर को यज्ञकुंड में कूद कर नष्ट कर लिया था तब शिव उनके मृत शव को लेकर दुखी हो रहे थे। इस अवसर पर शिव को मृत शरीर के मोह से निकालने के लिए भगवान विष्णु ने चक्र से उस शरीर के टुकड़े कर दिए थे। मान्यता है कि भगवान विष्णु के चक्र से खंडित होने पर सती की योनि नीलांचल पहाड़ पर गिरी थी। 51 शक्ति पीठों में कामाख्या महापीठ को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि यहां पर योनि की पूजा होती है। यही वजह है कि अम्बुवासी मेले के दौरान तीन दिन मंदिर में प्रवेश करने की मनाही होती है।

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