Ganesh Chaturthi 2019: यहां भगवान गणेश को चढ़ता है सिंदूर का चोला

Ganesh Chaturthi 2019: यहां भगवान गणेश को चढ़ता है सिंदूर का चोला

Devendra Kashyap | Updated: 26 Aug 2019, 06:04:10 PM (IST) मंदिर

Ganesh Chaturthi 2019: यहां गणेश भक्त गणपति पर सिंदूर का चोला चढ़ाते हैं।

Ganesh Chaturthi के अवसर पर हम आज आपको एक ऐसे गणेश मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां गणेश भक्त गणपति पर सिंदूर का चोला चढ़ाते हैं। इस मंदिर का नाम मोती डूंगरी गणेश मंदिर ( moti dungri ganesh ji temple ) है। यह मंदिर राजस्थान के जयपुर में स्थित है। यह मंदिर भगवान गणेश के प्रमुख मंदिरों में एक माना जाता है।

भगवान गणेश को समर्पित इस गणेश मंदिर ( Ganesh Temple ) में लोग दूर-दूर से दर्शन करने आते हैं और स्थापित गणेश जी से अपनी मनोकामना पूर्ति की कामना करते हैं। यहां दाहिनी सूंड़ वाले गणेशजी की विशाल प्रतिमा है, जिस पर सिंदूर का चोला चढ़ाकर भव्य श्रृंगार किया जाता है।

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'गणेश चतुर्थी' के अवसर पर यहां लाखों की संख्या श्रद्धालु आते है। इस मंदिर के प्रति लोगों की खास आस्था और विश्वास जुड़ा हुआ है। इस मंदिर को लेकर लोगों की कई मान्यताएं प्रचलित हैं। उन्हीं मान्यताओं में से एक मान्यता यहां की मूर्ति से जुड़ी है और दूसरी मान्यता बुधवार को लेकर प्रचलित है। चलिए आपको बताते हैं इस मंदिर से जुड़ी कुछ रोचक बातें..

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जयपुर में मोती डूंगरी स्थित गणेश मंदिर जयपुरवासियों के लिए प्रथम अराध्य माने जाते हैं। मंदिर को लेकर लोगों की मान्यता है कि यदि कोई भी व्यक्ति नया वाहन लेता है, तो उसे सबसे पहले मोती डूंगरी गणेश मंदिर में लाने की परंपरा है। नवरात्रि, रामनवमी, धनतेरस और दीपावली जैसे खास मुहूर्त पर वाहनों की पूजा के लिए यहां लंबी कतारें लग जाती हैं। लोगों का मानना है कि नए वाहन की यहां लाकर पूजा करने से हादसा नहीं होता। इसके अलावा यहां शादी के समय पहला निमंत्रण-पत्र मंदिर में चढ़ाने की परंपरा है। मान्यता है कि निमंत्रण पर गणेश उनके घर आते हैं और शादी-विवाह के सभी कार्यों को शुभता से पूर्ण करवाते हैं।

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मंदिर का इतिहास

मोती डूंगरी की तलहटी में स्थित भगवान गणेश का यह मंदिर जयपुरवासियों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इतिहासकार बताते हैं कि यहां स्थापित गणेश प्रतिमा जयपुर नरेश माधो सिंह प्रथम की पटरानी के पीहर मावली से 1761 ई. में लाई गई थी। मावली में यह प्रतिमा गुजरात से लाई गई थी। उस समय यह पांच सौ वर्ष पुरानी थी। जयपुर के नगर सेठ पल्लीवाल यह मूर्ति लेकर आए थे और उन्हीं की देख-रेख में मोती डूंगरी की तलहटी में इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था।

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