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पूरे साल में सिर्फ 5 घंटे के लिए खुलता है ये मंदिर, देते हैं हजारों बकरों की बलि

निराई माता के मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि यहां हर साल चैत्र नवरात्र के दौरान स्वतः ही ज्योति प्रज्जवलित होती है

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Sunil Sharma

May 02, 2016

Nirai Mata Temple

Nirai Mata Temple

कहा जाता है कि हर धार्मिक स्थल का अपना एक रहस्य और महत्व होता है जो किसी और जगह पर नहीं होता। भारत में तो ऐसे स्थानों की कमी नहीं है। ऐसे ही मंदिरों में शामिल एक निराई माता मंदिर के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं।

कहां है निराई माता मंदिर
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर स्थित निराई माता मंदिर श्रद्घालुओं एवं भक्तों का आकर्षण का केंद्र है। यह मंदिर साल में एक ही बार खुलता है और वो भी केवल सुबह 4 बजे से 9 बजे तक यानि केवल 5 घंटे के लिए। लेकिन इन पांच घंटों में माता के दर्शनों के लिए हजारों भक्त देश के दूर-दराज इलाकों से आते हैं।

नवरात्रों में स्वतः प्रज्जवलित होती है ज्योत
निराई माता के मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि यहां हर साल चैत्र नवरात्र के दौरान स्वतः ही ज्योति प्रज्जवलित होती है जो लगातार नवरात्रों के नौ दिन तक बिना तेल या दीपक के जलती रहती है। यह कैसे प्रज्ज्वलित होती है और क्यों होती है यह आज तक एक रहस्य ही बना हुआ है। इस चमत्कार के चलते ग्रामीण यहां पूजा-अर्चना करते हैं।

स्थानीय निवासियों के अनुसार निरई माता की उंची पहाड़ी में जातरा के एक सप्ताह पूर्व प्रकाश पुंज ज्योति के समान चमकता हैं। चैत नवरात्रि के प्रथम सप्ताह रविवार को जातरा मनाया जाता हैं। अगर कोई माता के दर्शन के लिए शराब सेवन किया हुआ या बुरा सोचने वाला आ जाए तो उस व्यक्ति को मधुमक्खियों का कोप भाजन बनना पड़ता है।

प्रसाद में चढ़ता है केवल नारियल
जहां देवी के सभी मंदिरों
में माता को सिंदूर, सुहाग, श्रृंगार, कुमकुम, गुलाल, बंदन नहीं चढ़ाया
जाता है वहीं निराई माता के ये सब नहीं चढ़ता। उन्हें केवल नारियल,
अगरबत्ती ही अर्पित की जाती है।

महिलाओं को जाने की नहीं है इजाजत
इस मंदिर में महिलाओं को अंदर प्रवेश तथा पूजा-पाठ की अनुमति नहीं है। महिलाओं को तो यहां प्रसाद खाना भी वर्जित है। अगर कोई महिला ऐसा कर लें तो उसे कुछ-न-कुछ बुरा भुगतना पड़ता है। यहां केवल पुरुष ही यहां पर पूजा-पाठ करते हैं।

एक दिन में चढ़ती है हजारों बकरों की बलि
मान्यता है कि मां से मांगी गई मान्यता के पूरी होने पर माता को भेंटस्वरूप कुछ न कुछ जरूर अर्पण करना चाहिए। अतः बहुत से लोग यहां आकर माता को जानवरों की बलि चढ़ाते हैं। चैत्र नवरात्रों के पहले दिन जब मंदिर भक्तों के लिए खोला जाता है, उस समय यहां हजारों श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर जानवरों खास तौर पर बकरों की बलि चढ़ाते हैं।

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