नागपंचमी विशेष : यहां साल में एक बार शिव जी को नमन करने आता है नाग-नागिन का जोड़ा, नहीं पहुंचाता कोई नुकसान

नागपंचमी विशेष : यहां साल में एक बार शिव जी को नमन करने आता है नाग-नागिन का जोड़ा, नहीं पहुंचाता कोई नुकसान

Tanvi Sharma | Publish: Aug, 12 2018 06:07:11 PM (IST) मंदिर

नागपंचमी विशेष : यहां साल में एक बार शिव जी को नमन करने आता है नाग-नागिन का जोड़ा, नहीं पहुंचाता कोई नुकसान

देशभर में ऐसे कई रहस्यमय शिव मंदिर हैं, जहां भोलेनाथ के चमत्कार तो नजर आते हैं, लेकिन इन चमत्कारों का कारण कोई नहीं जानता। श्रद्धालु इसे भगवान शिव की महिमा ही मानते हैं। ऐसा माना जाता है कि शिव जिसकी भक्ति से प्रसन्न हो जाते हैं उसे मनवांधित फल प्रदान करते हैं। इस बात के प्रमाण भी मिलते हैं कि आदिकाल से ही शिव की पूजा होती आयी है, और वे पृथ्वी पर मौजूद सभी जीवों के प्रिय भी हैं। यही वजह है कि शिवजी को पशुपतिनाथ भी कहा जाता है। अन्य जीवों की तरह ही नाग भी भोलेनाथ की भक्ति करते हैं और आज जिस स्थान के बारे में हम आपको बता रहे हैं वहां पर तो नाग-नागिन का जोड़ा भगवान शिव की पूजा अर्चना करने भी आता है। आश्चर्य की बात यह है कि नाग-नागिन का यह जोड़ा यह किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता और सिर्फ पूजा कर चला जाता है।

हम जिस मंदिर की बात कर रहे हैं वह मंदिर हरियाणा में कैथल जिले में पेहवा के नजदीक अरूणाय स्थित श्री संगमेश्वर महादेव मंदिर है। सावन माह में मंदिर में लाखों श्रद्धालु शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। वहीं हर महीने की त्रयोदशी पर मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। सावन माह के सोमवार पर दिनभर श्रद्धालु मंदिर में पूजा अर्चना करने आते हैं। कहा जाता है कि साल में एक बार यहां नाग-नागिन का जोड़ा आता है और शिवलिंग की पूजा करके चला जाता है। इन्होंने आज तक किसी भी श्रद्धालु को नुकसान नहीं पहुंचाया। मंदिर के पुजारी का कहना है की नाग-नागिन यहां आकर शिव प्रतिमा की परिक्रमा करते हैं। वहीं पुराणों के अनुसार यहां भगवान शिव स्वयं शिवलिंग के रुप में प्रकट हुए थे, जोकी सदियों से यहां विराजमान हैं।

shiv mandir

मंदिरों में पूजा का महत्व

श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के थानापति के अनुसार संगमेश्वर महादेव मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग है, जोकि ऋषि मुनियों की कठोर तपस्या के फल स्वरूप धरती से निकले हैं। श्रद्धालुओं की भक्ति से शिवलिंग जल्दी ही प्रसन्न होते हैं और सावन माह में भगवान शिव का धरती पर वास भी होता है। इसलिए इस महीने में श्रद्धालुओं द्वारा जलाभिषेक व पूजा-अर्चना करने से उन्हें फल की प्राप्ति होती है। मंदिर में प्रतिदिन करीब सवा लाख बेल पत्र शिवलिंग पर चढ़ते हैं। कई प्रकार के द्रव्य जैसे गन्ने का रस, दूध, शहद, गिलोये, बेल का रस व गंगाजल आदि से शिवलिंग का अखंड अभिषेक भी किया जाता है।

 

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राजनेता व व्यापारी भी आते हैं माथा टेकने

लोगों की मान्यता हैं कि सावन माह में स्वयंभू शिवलिंग पर जलाभिषेक करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, जो भी श्रद्धालु यहां पर पूरी श्रद्धा से पूजा-अर्चना करता है, उसके सभी काम बनते हैं। यहां मंदिर में राजनेताओं व व्यापारियों का भी आस्था का केंद्र हैं। यहां चुनाव लड़ने से पूर्व बहुत से नेता मन्नत मांगते हैं और पूरी होने पर यहां पूजन व धागा खोलने के लिए आते हैं। मंदिर को लेकर यह भी मान्यता है की यहां देवी सरस्वती ने श्राप मुक्ति के लिए शिव-आराधना की थी।

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मंदिर का इतिहास

मंदिर के इतिहास के बारे में बताया जाता है की पुरातन काल में अरुणा संगम तीर्थ की महिमा महाभारत वामन-पुरान, गरूड़ पुराण, संकद पुराण, पदम पुराण आदि ग्रंथों में वर्णित है। मंदिर के विषय में एक लोक कथा है कि ऋषि वशिष्ठ और ऋषि विश्वामित्र में जब अपनी श्रेष्ठता साबित करने की जंग हुई, तब ऋषि विश्वामित्र ने मां सरस्वती की सहायता से बहा कर लाए गए ऋषि वशिष्ठ को मारने के लिए शस्त्र उठाया, तभी मां सरस्वती ऋषि विशिष्ट को वापस बहा कर ले गई। तब ऋषि विश्वामित्र ने सरस्वती को रक्त व पींप सहित बहने का श्राप दिया। इससे मुक्ति पाने के लिए सरस्वती ने भगवान शंकर की तपस्या की और भगवान शंकर के आशीर्वाद से प्रेरित 88 हजार ऋषियों ने यज्ञ द्वारा अरूणा नदी व सरस्वती का संगम कराया। तब इस श्राप से सरस्वती को मुक्ति मिली। नदियों के संगम से भोले नाथ संगमेश्वर महादेव के नाम से विश्व में प्रसिद्ध हुए।

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