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एक रात में चट्टान काटकर बनाया गया शिव मंदिर, नहीं होती शिवलिंग की पूजा

यहां स्थित है एक हथिया देवाल नाम काअभिशप्त देवालय, लेकिन नहीं की जाती भगवान शिव की पूजा। जानिए रहस्य...

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Bhup Singh

Sep 23, 2015

Ek Hathiya Deval Uttarakhand

Ek Hathiya Deval Uttarakhand

उत्तराखंड राज्य में 70 किलोमीटर दूर स्थित कस्बा थल जिससे लगभग छ: किलोमीटर दूर स्थित है ग्राम सभा बल्तिर। यहां एक हथिया देवाल नाम का अभिशप्त देवालय है। यह भगवान शिव को समर्पित है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं, भगवान भोलेनाथ का दर्शन करते हैं, मंदिर की अनूठी स्थापत्य कला को निहारते हैं। इस मंदिर की खास बात यह है कि लोग यहां भ्भगवान शिव के दर्शन करने तो आते हैं, लेकिन यहां भगवान पूजा नहीं की जाती।

एक हाथ से बना हुआ है ये मंदिर


इस मंदिर का नाम एक हथिया देवाल इस पड़ा क्योंकि यह एक हाथ से बना हुआ है। यह मंदिर बहुत पुराना है और पुराने ग्रंथों, अभिलेखों में भी इसका जिक्र आता है। किसी समय यहां राजा कत्यूरी का शासन था। उस दौर के शासकों को स्थापत्य कला से बहुत लगाव था। यहां तक कि वे इस मामले में दूसरों से प्रतिस्पर्द्धा भी करते थे। लोगों का मानना है कि एक बार यहां किसी कुशल कारीगर ने मंदिर का निर्माण करना चाहा। वह काम में जुट गया। कारीगर की एक और खास बात थी। उसने एक हाथ से मंदिर का निर्माण शुरू किया और पूरी रात में मंदिर बना भी दिया।

अनूठी स्थापत्य कला

मंदिर की स्थापत्य कला नागर और लैटिन शैली की है। चट्टान को तराश कर बनाया गया यह पूर्ण मंदिर है। चट्टान को काट कर ही शिवलिंग बनाया गया है। मंदिर का साधारण प्रवेश द्वार पश्चिम दिशा की तरफ है। मंदिर के मंडप की ऊंचाई 1.85 मीटर और चौड़ाई 3.15 मीटर है। मंदिर को देखने दूर- दूर से लोग पहुंचते हैं, परंतु पूजा अर्चना निषेध होने के कारण केवल देख कर ही लौट जाते हैं।

इसलिए नहीं होती पूजा
एक कहावत हैे कि इस ग्राम में एक मूर्तिकार रहता था जो पत्थरों को काटकाटकर मूर्तियां बनाया करता था। एक बार किसी दुर्धटना में उसका एक हाथ जाता रहा। एक वह अपने गांव से निकल गया। गांव का दक्षिणी छोर में एक बहुत विशाल चट्टान थी। अगले दिन प्रात:काल जब गांव वासी उस तरफ गए तो पाया कि किसी ने रात भर में चट्टान को काटकर एक देवालय का रूप दे दिया है। कोतूहल से सबकी आंखे फटी रह गई। सारे गांववासी वहां पर एकत्रित हुए परन्तु वह क ारीगर नहीं आया जिसका एक हाथ कटा था। सभी गांववालों ने गांव मे जाकर उसे ढूंढा और आपस में एक दूसरे उसके बारे में पूछा परन्तु उसके बारे में कुछ भी पता न चल सका , वह एक हाथ का कारीगर गांव छोड़कर जा चुका था।

जब स्थानीय पंडितों ने उस देवालय के अंदर उकेरी गई भगवान शंकर के लिंग और मूर्ति को देखा तो यह पता चला कि रात्रि में शीघ्रता से बनाए जाने के कारण शिवलिंग का अरघा विपरीत दिशा में बनाया गया है जिसकी पूजा फलदायक नहीं होगी बल्कि दोषपूर्ण मूर्ति का पूजन अनिश्टकारक भी हो सकता है। बस इसी के चलते रातो रात स्थापित हुए उस मंदिर में विराजमान शिवलिंग की पूजा नहीं की जाती। पास ही बने जल सरोवर में (जिन्हे स्थानीय भाषा में नौला कहा जाता है) मुंडन आदि संस्कार के समय बच्चों को स्नान कराया जाता हैं।

एक अन्य कहानी

जबकि एक अन्य कथा में यह कहा जाता है की एक बार एक राजा ने एक कुशल कारीगर का एक हाथ मात्र इसलिए कटवा दिया की वो कोई दूसरी सुन्दर ईमारत न बनवा सके। लेकिन राजा कारीगर के हौसले को नहीं तोड़ पाया। उस कारीगर ने एक ही रात में एक हाथ से एक शिव मंदिर का निर्माण किया और हमेशा के लिए वो राज्य छोड़कर चला गया। जब जनता को यह बात मालूम हुई तो उसे बहुत दुख हुआ। लोगों ने यह फैसला किया कि उनके मन में भगवान भोलेनाथ के प्रति श्रद्धा तो पूर्ववत रहेगी लेकिन राजा के इस कृत्य का विरोध जताने के लिए वे मंदिर में पूजन आदि नहीं करेंगे।

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