
Arihant Parmeshthi is the seat of 24 Gods with God
टीकमगढ़. संवत १२०२ का अति प्राचाीन मंदिर पपौरा जैन मंदिर है। जो प्राचीन समय में पम्पापुर के नाम से जाना जाता था। उस मंदिर में अरिहंत परमेष्ठी भगवान भोयरा में विराजमान है। यह मुख्यालय से ४ किमी की दूरी पर है। वहां पर १११ जैन मंदिर है और यह अतिशय क्षेत्र है। बुंदेलखंड का विशाल नंदीश्वर दीप भी है। स्वर्ण रथ मंदिर, मंदिरों का प्रवेश द्वार से होते हुए सभी मंदिर में जाना होता है। वहीं छह मंदिर और आठ चरण पादुकाएं भी बनी है।
नगर के शिवपाल नुना बताते है कि अतिशय क्षेत्र पपौरा चमत्कारी क्षेत्र है। जो मुख्यालय से ४ किलोमीटर की दूरी सागर रोड पर स्थित है। एक ऐसा पुरातन तीर्थ क्षेत्र है, जहां एक से बढकर एक जैन मंदिर समतल भूमि पर स्थित है। उन मंदिरों में हजारों वर्ष पुरानी प्रतिमाएं विराजमान है। इन हजारों वर्ष प्राचीन प्रतिमाओं के दर्शन करने से पाप संताप दूर हो जाते हैं। अतिशय क्षेत्र पपौरा में हजारों वर्ष प्राचीन जैन प्रतिमाएं विराजमान है। यह संपूर्ण भारतवर्ष का जैन धर्म का प्रमुख केंद्र है।
उनका कहना था कि बुंदेलखंड तीर्थ क्षेत्रों की भूमि है। यहां जैनियों के सिद्ध क्षेत्र के साथ साथ अतिशय क्षेत्र भी है, जिसे पपौरा के नाम से जाना जाता है। संवत 1202 से लेकर आज तक के कमलाकर, भोंयरे, मेरु, अट्टालिका शैली के मंदिर विधमान है। मंदिर नंबर 35 खजुराहो शैली का मंदिर है तो 75 नम्बर रथकार मंदिर भगवान नेमिनाथ को समर्पित है। विशाल मंदिर की बनाबट रथ के आकार की जैसे कोई रथ दौड़ा हुआ सरपट भागा जा रहा हो। खूबसूरत नवनिर्मित नंदीश्वर द्वीप की रचना इतनी सुंदर है कि बाकी जगह के इसके आगे फ ीके लगते है।
पपौरा जी का प्राचीन नाम पमपापुर नाम है प्रसिद्ध है
प्रदीप कुमार जैन बताते है कि पपौराजी में 800 वर्ष से भी अधिक प्राचीन भगवान आदिनाथ की प्रतिमा काले पाषाण से निर्मित है। सबसे पुराने मंदिरों को प्राचीन समुच्चय कहा जाता है। इसमें दो भूमिगत कक्षों जो 12 वीं सदी के है। 1860 में 24 मंदिरों के एक अद्वितीय क्लस्टर का निर्माण किया गया था। उसी समय रथ के आकार के मंदिर का भी निर्माण किया गया था।
एक अतिशय और दो सिद्ध क्षेत्र
टीकमगढ़ से 40 किमी दूर दगंबर जैन अतिशय सिद्ध क्षेत्र बंधा जी ऐसा पावन पुनीत तीर्थ क्षेत्र जहां हजारों वर्षों से धर्म की ज्योति निर्बाध रुप से जल्दी आ रही है। प्राचीन जैन तीर्थ क्षेत्र बम्होरी बराना से 7 किमी की दूरी पर दक्षिण दिशा की ओर सुरम्भ। पहाडियों के मध्य स्थित है। बंधा जी जैन पुरातत्व कला का उत्कृष्ट स्थान है।
जंगीरों में बध गया था औरंगजेब, तभी से बंधा जी का नाम हुआ प्रसिद्ध
उनका कहना था कि बताया किÓइतिहासकारों का कथन है कि जब मूर्ति भंजक औरंगजेब अनेक स्थानों की मूर्तियों को नष्ट करता हुआ बंधा जी क्षेत्र पर पहुंचा तो उसने जैसे ही भगवान अजितनाथ की मूर्ति के ऊपर हथौड़े से प्रहार किया। उसी क्षण वह जंजीरों से बंध गया। जब उसे अपने किए हुए पर पश्चाताप हुआ और उसने कहा हे भगवान मुझे आप इस बंधन से मुक्त कर दे, मैं अब ऐसा नहीं काुंगा और आपकी शरण में रहूंगा। तभी से इस क्षेत्र का नाम बंधा जी पड़ा।
वह बताते है कि इतिहास के पन्ने देखते हैं तो अतिशय क्षेत्र बंधा जी का नाम सबसे ऊपर आता है। यहां पर विराजमान अजितनाथ भगवान की प्रतिमा 1000 वर्ष से अधिक प्राचीन है । प्रतिमा के ऊपर जो स्वस्ति लिखी है, वह चैत्र सुदी तेरस संवत 1199 ईस्वी की अंकित है । जिसे आज हम पढ़ सकते हैं, अजितनाथ के दाएं और एवं बाए ओर दो प्रतिमाएं खडग़ासन में विराजमान है । एक प्रतिमा संभवनाथ एवं दूसरी प्रतिमा आदिनाथ भगवान की है जो संवत 1209 ईसवी की है ।
Published on:
31 Aug 2022 08:08 pm

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