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भगत सिंह के प्यार भरे सुनहरे हिन्दुस्तान का सपना अब भी अधूरा

शहीद-ए-आजम के भतीजे किरण जीत सिंह ने की पत्रिका की खास मुलाकात

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Bhagat Singh-Kiran Jeet Singh

Bhagat Singh-Kiran Jeet Singh

टीकमगढ़. महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के अवसर पर भगत सिंह के भतीजे किरण जीत सिंह का नगर में आगमन हुआ। वह यहां पर राष्ट्रवादी विचार परिषद के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आए हुए थे। इस अवसर पर पत्रिका ने उनसे भगत सिंह, उनके सपनों एवं समाज के तमाम मुद्दो पर बातचीत की। इसका उन्होंने बड़ी ही बेबाकी से जबाब दिया। पेश हैं किरण जीत से हुई बातचीज के मुख्य अंश।


पत्रिका: भगत सिंह का अनुशरण करने वाली युवा पीढ़ी, उन्हें हिंसा के मार्ग का पैरोकार मानती हैं। भगत सिंह जी किस स्वाभाव के व्यक्ति थे।
किरणजीत सिंह: भगत सिंह बहुत ही विनोद प्रिय एवं खुश मिजाज थे। उनका जैसा चित्रण किया गया हैं, कि वह बम और हथियार में यकीन रखते थे, ऐसा नहीं हैं। वह खुद लिखते हैं कि बम और पिस्तौल से क्रांति नहीं लाई जा सकती हैं। क्रांति की तलवार विचारों के साथ तेज होती हैं। साइमन कमीशन के आंदोलन में जब लाला लाजपत राय शहीद हुए तो देश के लोगों को शर्म आई। उस समय बंगाल की नेत्री वासंती देवी ने कहा था कि क्या इस देश की तरूणाई में ऐसा कोई बचा हैं, जो इसका प्रतिशोध ले सकें। तब भगत सिंह ने इसे चैलेंज के रुप में स्वीकारा। भगत सिंह ने खुद कहा हैं कि मुझे मनुष्य का खून बहाने का खेद हैं। लेकिन राष्ट्रीय अस्मिता को बचाने में वह क्षण आता हैं, जब लोगों को किसी एक पक्ष में होना पड़ता हैं। उन्होंने दो जनविरोधी बिलों के लिए संसद में बम धमका किया। लेकिन इसका उद्देश्य किसी को हानि पहुंचाना नहीं था, बल्कि अंग्रेज सरकार को यह संदेश देना था कि इस देश की जनता अब जाग गई हैं।

पत्रिका: भगत सिंह जी ने जेल से कई पत्र लिखे, कोई ऐसा खास पत्र, जो आपको याद हों।
किरणजीत सिंह: उन्होंने अपनी शहादत के पूर्व 3 मार्च 1931 को मेरे पिता सरदार कुलतार सिंह को पत्र लिखा था। यह उनका आखिरी पत्र था। इसमें उन्होंने मेरे पिता को अपना ध्यान रखने, मन लगाकर पढ़ाई करने की बात कहीं थी। इस पत्र के अंत में उन्होंने उर्दू में कुछ शायरियां लिखी थी। इसमें अंग्रेज सरकार की प्रताडऩा को बताते हुए उन्होंने लिखा था
उसे यह फ्रिक हैं हरदम, नई तर्जे जफा क्या हैं,
हमें यह शौक हैं, देखे सिमत की इंतिहा क्या हैं।
इसके बाद उन्होंने लिखा था कि मैं सुबह के उस दीपक की तरह हूं, जिसे बुझा दिया जाएगा। यह मावन शरीर मुट्ठी भर राख हैं। मगर मेरे विचार जिंदा रहेंगे। खुश रहो एहले वतन हम तो सफर करते हैं।

पत्रिका: भगत सिंह जाति और धर्म के आधार पर समाज के फैल रही वैमस्यता के विरोध में थे। यदि वर्तमान में भगत सिंह होते तो क्या करते।
किरणजीत सिंह: भगत सिंह जी जाति और धर्म की दीवाल तोडऩा चाहते थे। वर्तमान में भगत सिंह जी इसके विरोध में होते। उनका सपना केवल अंग्रेजों को भगना नहीं था। बल्कि उनका सपना एक ऐसे समाज का निर्माण करना था, जिसमें सभी को बराबरी का दर्जा हो। किसी का शोषण न हों। कोई किसी का हक न मारे। वो चाहते थे सभी वर्गो, सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार मिले। भगत सिंह जी ने जिस प्यार भरे, सुनहरे हिंदुस्तान के सपने को लेकर शहादत दी थी, वह सपना अभी पूरा नहीं हुआ हैं। यकीनन 70 वर्षों में देश ने बहुत प्रगति की हैं। लेकिन आज भी किसानों को उनकी फसलों का सही मूल्य नहीं मिल रहा हैं। किसान आत्महत्या कर रहे हैं, बेरोजगारी बड़ रही हैं, भ्रष्टाचार बड़ रहा हैं। वह सभी बातों के खिलाफ थे।
पत्रिका: युवाओं के लिए क्या संदेश देना चाहते हैं।
किरणजीत सिंह: आज के युवाओं को यही संदेश हैं कि भगत सिंह के जीवन से प्रेरणा लें। किसी भी बात को तार्किक कसौटी पर कसे बिना विश्वास न करें। चाहे वह बात बड़े से बड़े व्यक्ति ने ही क्यों न कहीं हो। उसे जांच परख कर विश्वास करें। नहीं तो सोशल मीडिया और दूसरे माध्यम देश की अखंडा के लिए खतरा हो सकते हैं।