बुंदेलखंड में जिस देशी पान की मिठास के कायल मुम्बई, लखनऊ, दिल्ली, नेपाल, पाकिस्तान और कई महानगर हुआ करते थे। उसकी खेती अब शासन प्रशासन की अनदेखी से विलुप्ति की कगार पर है।
टीकमगढ़.बुंदेलखंड में जिस देशी पान की मिठास के कायल मुम्बई, लखनऊ, दिल्ली, नेपाल, पाकिस्तान और कई महानगर हुआ करते थे। उसकी खेती अब शासन प्रशासन की अनदेखी से विलुप्ति की कगार पर है। हम बात कर रहे हैं टीकमगढ़ जिला की ग्राम पंचायत चंदेरा के पान की। गांव में २५० के लगभग किसान पहले कभी पान की खेती किया करते थे। अब उनकी संख्या ४५ के करीब रह गई है। रोजी रोटी और भरण-पोषण के लिए गेहूं की खेती करने को मजबूर हैं।
देश और बुंदेलखंड में पान खाने की परंपरा मुगल काल से चली आ रही है। टीकमगढ़ जिले के चंदेरा में पीडिय़ों से यहां रहने वाला चौरसिया समाज पान की खेती करता रहा है। महंगाई अधिक होने से और पान के पत्ते का दाम सही नहीं मिलने, क्षेत्र का जलस्तर नीचे होने, शासन की बेरुखी के चलते इस खेती से अब किसानों का मोह भंग हो चुका है। चंदेरा छोड़ मडिया, जतारा, पलेरा, बल्देवगढ़ में पान की खेती करना किसानों ने बंद कर दिया है।
हम जब चंदेरा के किसान हरिप्रसाद चौरसिया, कुंवर लाल, रामकिशन, रमेश, भुवंरलाल, गोरेलाल, रामगोपाल, जानकी शुक्लाल, रामचरन, प्रकाश, मुनई, कमलेश, पप्पू, भरत, मोनू चौरसिया से मिले जो पहले कभी पान की खेती किया करते थे। उनका बात करते करते दर्द भी साफ देखने को मिला। किसान मातादीन, घनश्याम दास से हमने बात की तो उनका कहना था यह देशी पान मध्यप्रदेश के साथ-साथ बहराइच, सुल्तानपुर, प्रयागराज, आगरा अलीगढ़, मथुरा, मुरादाबाद, मुजफ्फ र नगर, बनारस, कानपुर, राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र के मुंबई नागपुर, दिल्ली, पड़ोसी देश पाकिस्तान और नेपाल तक जाता था। एक जमाने में बड़ी अच्छी पैदावार होती थी और हम लोग इसे करते थे।
२५० परिवार करते थे पान की खेती
१० वर्ष पहले चंदेरा गांव में २५० से अधिक किसान देशी पान का बरेजा लगाकर खेती करते थे। आज उनमें से ४५ किसान ही बरेगा लगाए हुए है। बुंदेलखंड में लगातार प्राकृतिक आपदा से तैयार पान की फसलें खराब होती गई और किसानी बंद होती गई। अब उनकी मांग भी हो रही है लेकिन उत्पादन घट जाने से बिक्री में भी कमी आई है।
नहीं मिल रहा अनुदान
खिल भारतीय चौरसिया समाज के कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष एन डी चौरसिया बताते है कि सरकार द्वारा उद्यानिकी फ सलों को बढ़ावा देने और आत्मनिर्भर बनाने के लिए बीते 3 साल से पान की खेती करने वाले पान किसानों को अनुदान नहीं दिया जा रहा है जबकि पहले शासन द्वारा 25 से 35 फीसदी अनुदान दिया जाता था लेकिन अब शासन ने बंद कर दिया है। उसके बाद पान किसानों को प्रशिक्षण देने के लिए जो अनुसंधान केंद्र बना था उसे भी सरकार ने बंद कर दिया है जिसे चालू कराए जाने की मांग की जा रही है। इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने कल्याण बोर्ड का गठन करने की बात कही थी लेकिन उसका गठन नहीं हो पाया है।
इनका कहना
यह बात सही है कि बीते 3 साल से पान की खेती करने वाले किसानों को सब्सिडी नहीं मिलती है। जिसका कारण यह है कि किसानों के द्वारा ऑनलाइन पंजीयन कराने के बाद जीएसटी के बिल विभाग को प्रस्तुत नहीं किए जा रहे हैं। जिससे किसानों को विभाग के द्वारा मिलने वाली अनुदान राशि पान किसानों को नहीं मिल रही है।
धर्मेंद्र मोर्या विकास खंड के उद्यानिकी अधिकारी जतारा।