14 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बेटी के निधन का दर्द बन गया मानवता के लिए दवा

6 दोस्तों ने बेटी को यादों में जीवित रखने उसके नाम पर बनाया ईशानिका मेमोरियल फाउंउेशन - पिछले तीन सालों में 1300 यूनिट कर चुके है रक्तदान

2 min read
Google source verification
Ishanika Memorial Foundation

Ishanika Memorial Foundation

टीकमगढ़. इशरत-ए-कतरा है दरिया में फना हो जाना, दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना। मिर्जा गालिब का यह शेर ईशानिका मेमोरियल फांउडेशन की स्थापना करने वाले 6 युवाओं पर पूरी तरह से सार्थक करते दिख रहे है। अपने दोस्त की जिस बेटी को दिन भर कंधों पर घुमाते थे, उसकी मौत के दुख ने इन युवाओं को ऐसी राह दिखाई कि यह दूसरे लोगों के लिए दवा बन गई।


आज से तीन साल पहले प्रियंक वैद्य की डेढ़ साल की मासूम ईशानिका वैद्य की खेलते समय गिर जाने से मौत हो गई थी। इस बिटिया की मौत के बाद जब उसके दोस्त उसकी पार्थिव देह को अपने हाथों से मुक्तिधाम ले गए तो आंखों में आंसू थे और मन में सोच की थी कि यह जीवित कैसे हो सकती है। इस मासूम को जीवन देना तो संभव न था, लेकिन मन का विचार तीन साथ पहले 25 मई को उसके जन्मदिन पर उस समय सार्थक हो गया।

जब प्रियंक के 6 दोस्त इस बेटी की याद में जिला अस्पताल में फल वितरण करने पहुंचे और इनमें से चार लोगों ने बेटी की स्मृति में रक्तदान किया। वहां पर ब्लड बैंक प्रभारी ने पूंछा कि क्या आपका कोई संगठन है, जो चार लोग एक साथ ब्लड डोनेट करने आए है तो ब्लड डोनेट करने पहुंचे सौरभ जैन के मुंह से निकल गया ईशानिका मेमोरियल फांउडेशन। और यहां से शुरू होता है लोगों की सेवा का सफर। फांउडेशन के सदस्य एवं जिला अभिभाषक संघ के अध्यक्ष सुनील शर्मा बताते है कि यह युवा बेटी को इस तरह से लोगों की मदद कर जीवित बनाए हुए है।

जिले के साथ ही बाहर भी दे रहे सेवाएं
सौरभ जैन पाली ने बताया कि बेटी ईशानिका की याद में वह, राहुल देहाती, आशीष जैन, प्रियंक वैद्य, अखिलेश जैन लारे, कमल शब्धानी ने जब यह शुरू किया तो इन्हें भी यकीन नहीं था कि वह लोग इतनें लोगों की मदद कर सकते है या फिर इतनें लोग उनसे जुडऩे आगे आ जाएंगे। उन्होंने बताया कि अब तक उनके फांउडेशन से 2500 लोग जुड़ चुके है और पिछले तीन सालों में 1300 यूनिट रक्तदान किया जा चुका है।

इसमें 276 यूनिट जरूरत पडऩे पर वह लोग जिले बाहर जाकर भी लोगों की मदद कर चुके है। उन्होंने बताया कि फांउडेशन की बड़ागांव धसान, जतारा और पृथ्वीपुर में शाखाएं है। वहीं फांउडेशन द्वारा उसकी स्मृति में हर साल पौधा-रोपण भी किया जाता है। यह लोग अब तक पर्यावरण संरक्षण के लिए 300 पेड़ भी लगा चुके है। सेवा का यह प्रकल्प अनवर जाती है। संस्था को तीन साल होने पर मंगलवार को फांउडेशन के सदस्यों ने रक्तदान में सहयोग करने वालों का पौधे भेंट कर सम्मान भी किया। कलेक्टर सुभाष कुमार द्विवेदी को पौधा भेंट करने पहुंचे समिति के सदस्यों की कलेक्टर ने सराहना करते हुए कहा कि बेटी को स्मृतियों में जीवित रखने का इससे अच्छा कोई माध्यम नहीं हो सकता है।