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जब डॉक्टरों ने दे दिया जवाब, तब महिलाओं ने उठाया बेटी को बचाने का बीड़ा

बेटी के उपचार में तीन लाख रुपए से अधिक हो चुक है खर्च, सामान्य आने लगी रिपोर्ट

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the women took the initiative to save the daughter

the women took the initiative to save the daughter

टीकमगढ़. कहते यदि सच्चे मन से प्रयास किया जाए तो खुद भगवान भी आपकी सहायता करने लगते है। ऐसा ही कुछ हुआ है 16 साल की बेटी रश्मि खंगार के साथ। सिर में ब्रेन ट्यूमर के कैंसर बन जाने पर जब एम्स के डॉक्टरों ने भी उसे जवाब दे दिया तो शहर की कुछ महिलाओं ने इस बेटी का जीवन बचाने संघर्ष शुरू किया। आज रश्मि की हालत में सुधार है और डॉक्टर भी अब इसके जीवन को खतरे से बाहर बता रहे है।


बड़ागांव निवासी रश्मि खंगार को सिर में कान के पास ट्यूमर होने पर परिजन 2016 में उसे लेकर ग्वालियर गए। परिजनों की आर्थिक स्थिति ठीक न होने पर प्रशासन द्वारा आर्थिक मदद की गई और रश्मि का ऑपरेशन कराया गया। लेकिन यहां पर गलत ऑपरेशन होने पर यह ट्यूमर कैंसर में बदल गया। इसके बाद परिजनों द्वारा तीन साल तक दिल्ली एम्स में उपचार कराया गया और फिर वहां से डॉक्टरों ने भोपाल एम्स भेज दिया। यहां पर उपचार के बाद डॉक्टरों ने रश्मि के जीवन को खतरा बताते हुए परिजनों को आगे उपचार करने से मना कर दिया और घर पर ले जाकर सेवा करने की बात कही। यहां पर डॉक्टरों ने बताया कि अब ऑपरेशन ही एक मात्र विकल्प है, लेकिन उसमें भी रश्मि के जीवत बचने या शेष जीवन ठीक होने की कोई गारंटी नहीं है। इसका खर्च भी 6 लाख रुपए बताया गया। ऐसे में परिजन परेशान हो गए। रश्मि की बीमारी में पूरे जीवन की जमा पूंजा चला चुके उसके के पिता सीताराम उसे बचाने के लिए शासन-प्रशासन से गुहार लगाने लगे।

ऐसे में जब इसकी जानकारी मातृ छाया वृद्धाश्रम की संचालक महिला मंडल को हुई तो उन्होंने भी एम्स के डॉक्टरों से बात की और रश्मि को बचाने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा की सलाह दी गई। ऐसे में जिले के प्राकृतिक चिकित्सक डॉ हर्षित तिवारी से रश्मि के उपचार को लेकर सलाह ली गई तो उन्होंने चंडीगढ़ के नेचुरोथैपरी सेंटर के डॉक्टरों से सलाह ली और रश्मि को वहां भेजा। यहां पर रश्मि का लगातार 6 माह उपचार का खर्च 6 से 7 लाख रुपए बताया गया, जो रश्मि के परिजनों के लिए बहुत ज्यादा था। वहीं संस्था ने इसके लिए स्वास्थ्य विभाग से बात की तो स्वास्थ्य विभाग ने उसकी तमाम रिपोर्ट देखकर उसे हर प्रकार से नकार दिया। स्वास्थ्य विभाग के आलाधिकारियों का एक प्रकार से यह कहना था कि आप लोग नेचुरोथैरपी के नाम पर लोगों को बरगला रहे है।

खुद जुटाई व्यवस्था
एक बेटी के जीवन के लिए संघर्ष कर रही संस्था की श्रद्धा सिंह चौहान ने जब अधिकारियों का यह रूख देखा तो उन्होंने तय किया कि अब बिना किसी सरकारी सहयोग के इस बेटी के जीवन की लड़ाई लड़ी जाएगी। अक्टूबर माह से इस बेटी के उपचार के लिए संस्था की श्रद्धा चौहान और डॉ हर्षित तिवारी ने अपने समूह की महिलाओं की सहयोग से तमाम मशीनरी एवं दवाओं की व्यवस्था की और उसका उपचार शुरू किया।

जहां एम्स के डॉक्टरों ने रश्मि को सितंबर तक का मेहमान बताया था वहीं इनकी सेवा एवं समपर्ण से अब रश्मि स्वास्थ्य होने लगी है। वह मंगलवार को अपनी अर्धवार्षिक परिक्षा देने अपने गांव बड़ागांव गई हुई थी। डॉ हर्षित तिवारी ने बताया कि अभी दिसंबर लास्ट में उसके तमाम टेस्ट हुए थे, जिसमें रिपोर्ट अच्छी आई है। चंडीगढ़ में भी डॉक्टरों से कंस्टल किया है और उन्होंने अब रश्मि का जीवन खतरें से बाहर बताया है। वहीं श्रद्धा चौहान का कहना था कि वह बेटी को जब तक आश्रम में रखेंगी जब तक वह पूरी तरह से स्वास्थ्य नहीं हो जाती है। उन्होंने बताया कि उनके साथ इस अभियान में जुटी 60 महिलाएं इसका पूरा खर्च उठाएंगी।

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