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टीकमगढ़. जिले में राजशाही दौर के पुस्तकालय में 250 से 500 वर्ष पुरानी पांडुलिपियां सुरक्षित रखी हुई है। यह पांडुलिपियां पाली, ब्राह्मी और संस्कृति भाषाओं में लिखी गई है। जिले में इन भाषाओं के ज्ञाता न होने से इन पांडुलिपियों का अनुवाद नहीं हो पा रहा है। इन अनुवाद होने से यह जिले के इतिहास और ज्ञान के बड़े भंडार साबित हो सकती है।
जिले में पठन-पाठन की ऐतिहासिक परंपरा रही है। इस परंपरा के चलते 1930 में महाराजा वीर सिंह जू देव द्वितीय ने जिले में देवेन्द्र पुस्तकालय की स्थापना कराई थी। 8 साल बाद यह पुस्तकालय पूरे 100 साल का हो जाएगा। 1955 से इस पुस्तकालय का रख-रखाव शासन के पास है। इस पुस्तकालय में वर्तमान में 22 से 23 हजार पुरूतकें है। इनमें चारों वेद, पुराण के साथ ही राजशाही दौर से लेकर विंध्यप्रदेश निर्माण तक के कई महात्वपूर्ण गजेटियर एवं अन्य पुरूस्तें भी है। इस पुस्तकालय में सबसे महात्वपूर्ण सैकड़ों वर्ष पुरानी हो चुकी पांडुलिपियां है।
बिलकुल सुरक्षित है यह पांडुलिपियां
पुस्तकालय का प्रबंधन संभालने वाले लाइब्रेरियन विजय मेहरा का कहना है कि यह पांडुलिपियां 250 से 500 वर्ष पुरानी है। यह आयुर्वेद, धर्म और इतिहास से संबंधित है। संभवता इनमें से अधिकांश पांडुलिपियां राजश्रय में रहने वाले धर्माचार्य सिद्धबाबाओं द्वारा लिखी गई है। इसमें कई धार्मिक ग्रंथों का टीका भी शामिल है। उनका कहना है कि संभवता यह पुस्तकें पाली, ब्राह्मी और संस्कृति भाषाओं में लिखी जान पढ़ती है। इन भाषाओं के जानकार और विद्वान न मिलने से इनका अनुवाद नहीं हो पा रहा है। उनका कहना है कि यदि इनका अनुवाद हो जाता है तो समझ में आएगा कि यह कितनी उपयोगी है।
स्याही ऐसी जैसे आज ही खिली हो
इन पांडुलिपियों को देखने पर लगता है कि जैसे यह हाल ही में लिखी गई हो। मेहरा बताते है कि उस समय विभिन्न रसों का मिश्रण कर स्याही का निर्माण किया जाता था और लकड़ी की कलम से लिखा जाता था। उस समय कागज भी इतना सुलभ नहीं था। वह बताते है कि मोर पंख और बररु से लिखने का काम बाद में शुरू हुआ है। इन पांडुलिपियों को हर साल सर्दियों की धूम में सुखाया जाता है तो इन पर तीन-चार साल में सुरक्षा के लिए रसान का उपयोग किया जाता है।
Published on:
19 Nov 2022 08:20 pm

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