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राजस्थान के टोंक में स्थित विश्व विख्यात सुनहरी कोठी के मुआवजे का दावा किया खारिज, न्यायालय ने वारिसान होने के मांगे दस्तावेज

उक्त मामला अजीजुलहक बनाम राज्य सरकार के नाम से वर्ष1997 से न्यायालय में चल रहा है।  

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राजस्थान के टोंक में स्थित विश्व विख्यात सुनहरी कोठी के मुआवजे का दावा किया खारिज, न्यायालय ने वारिसान होने के मांगे दस्तावेज

टोंक. जिला न्यायालय के न्यायाधीश रविकुमार गुप्ता ने शहर स्थित ऐतिहासिक सुनहरी कोठी के मुआवजे के मामले में दायर की गई याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को टोंक रियासत के नवाब इस्माईल अली खां के वारिसान होने के दस्तावेज मांगे हैं।

ये दस्तावेज नहीं होने पर न्यायालय ने उनकी ओर से लगाईगईमुआवजे की याचिका को खारिज कर दिया। गौरतलब हैकि शहर स्थित ऐतिहासिक सुनहरी कोठी को वर्ष 1980 में राज्य सरकार के पुरातत्व विभाग ने अपने अधीन ले लिया था। इसके तहत राज्य सरकार ने उक्त कोठी का मुआवजा 34 लाख रुपए जारी किया था।

ये मुआवजा भूमि अवाप्ति अधिकारी की ओर से जारी की गई थी। इस मुआवजे को लेने के लिए न्यायालय में याचिका दायर की गई। इसमें अजीजुलहक, आफताब अली तथा शफीउल्ला बैग ने न्यायालय में याचिका दायर की थी।

इसमें अजीजुल्ला ने याचिका दायर की थी कि टोंक के नवाब इस्माईल अली खां ने उन्हें नजर बाग में कई सम्पतियों समेत सुनहरी कोठी दान की थी। शफीउल्ला बैग ने याचिका लगाई थी कि नवाब इस्माईल अली खां की पत्नी अजीजु जमानी बेगम उनके पिता की बहन थी।

वहीं आफताब अली खां ने याचिका लगाई थी कि नवाब इस्माईल अली खां के बाद टोंक के नवाब मासूम अली खां बने थे। मासूम अली खां के इंतकाल के बाद आफताब अली नवाब बने। ऐसे में तीनों ने अलग-अलग आधार पर सुनहरी कोठी का मुआवजा देने को कहा था।

लोक अभियोजक छोटेलाल सोलंकी ने बताया कि न्यायालय ने तीनों से नवाब इस्माईल अली खां के वारिसान होने के दस्तावेज मांगे हैं। छोटेलाल ने बताया कि कोर्ट ने तीनों को अलग-अलग माना है।

कोई भी इस्माईल अली खां का पुत्र या भाई नहीं है। अजीजुल्लाह को दान के दस्तावेज, शफी उल्लाह तथा आफताब अली को इस्माईल अली के वारिसान सम्बन्धित दस्जावेज पेश करने के निर्देश दिए हैं। गौरतलब है कि उक्त मामला अजीजुलहक बनाम राज्य सरकार के नाम से वर्ष1997 से न्यायालय में चल रहा है।


यह माना कोर्ट ने
न्यायालय ने माना हैकि सुनहरी कोठी नवाब इस्माईल अली खां की निजी सम्पत्ति है। उनकी मृत्यु के समय उनके वारिसान ही सुनहरी कोठी की मुआवजा राशि प्राप्त करने के अधिकारी है।

आफताब अली को नवाब के रूप में तथा अजीजुलहक को दान गृहिता के रूप में सुनहरी कोठी का मुआवजा प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। ऐसे में न्यायालय ने तीनों को उत्तराधिकार प्रमाण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।


यह है कि सुनहरी कोठी
सुनहरी कोठी का निर्माण टोंक रियासत के प्रथम नवाब मोहम्मद अमीर खां उर्फ अमीरुद्दोला खां ने 18 24 में कराया था। बाद के नवाब इब्राहिम अली खां ने कोठी में सोने-चांदी की नक्काशी कराई।

एक जीना (सीढिय़ां) तथा छोटे-बड़े दस दरवाजे वाली कोठी के दरवाजों को रंगीन कांच पर सुनहरी काम के साथ इस खूबी से बनाया गया कि ढलते सूरज की रोशनी महल में प्रवेश कर प्रतिदिन इन्द्रधनुष बनाती थी और पूरा महल रोशनी से नहा उठता था।

कोठी की दीवार एवं छतों को भी सोने के पानी से बने बेलबूटे, फूल, गुलदस्ते अलग ही छटा बिखेरते प्रतीत होते हैं। महल के एक हिस्से की भीतरी दीवारों पर जड़े छह शीशे पूरी कोठी का नजारा एक ही कोण से दिखाने में सक्षम हैं। जहां ये शीशे लगे हुए हैं, उस हिस्से को शीश महल नाम से जाना जाता था।