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मकर संक्रांति पर होता है दड़ा महोत्सव, 70 किलो कि फुटबॉल से खेलेंगे तीन हजार खिलाड़ी

14 जनवरी को मकर संक्रांति के मौके पररियासत काल से आवां कस्बे में दड़ा महोत्सव का आयोजन तत्कालीन राज परिवार की ओर से किया जाता रहा है। परंपरागत रूप से खेले जाने वाला दड़ा का खेल मौजूदा समय के फुटबॉल के खेल से मिलता जुलता है। खेलने वाले खिलाडिय़ों की तादाद हजारों में होती है।  

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मकर संक्रांति पर होता है दड़ा महोत्सव, 70 किलो कि फुटबॉल से खेलेंगे तीन हजार खिलाड़ी

मकर संक्रांति पर होता है दड़ा महोत्सव, 70 किलो कि फुटबॉल से खेलेंगे तीन हजार खिलाड़ी

कस्बे में हर साल 14 जनवरी को मकर संक्रांति के मौके पर मनाएं जाने वाले दड़ा महोत्सव की तैयारियां इन दिनों जोरों पर है। ग्रामीणों ने दड़ा बनाने का काम किया जा रहा है। विश्व प्रसिद्ध दड़ा महोत्सव का आयोजन करवाने वाले राज परिवार से ताल्लुक रखने वाले कुंवर कार्तिकेय ङ्क्षसह ने बताया कि हर साल की तरह इस साल भी दड़ा महोत्सव का आयोजन धूमधाम से किया जाएगा।

ऐसे होता है तैयार

लकड़ी के बुरादे बजरी और टाट से बना यह फुटबॉल (दड़ा) तकरीबन 70 किलो वजन का होता है। जिसे 15 दिनों की कड़ी मेहनत कर कारीगर बनाते हैं। वर्तमान में आवां में ग्रामीण इसको बनाने में जुटे हैं। युवा व बुजुर्गों में इसको लेकर खासा उत्साह बना हुआ है।

दड़ा करता है भविष्यवाणी

20 गांवों के लगभग तीन हजार लोग इस खेल में भागीदारी निभाते हैं। करीब दस हजार दर्शकों मकानों की छतों व गोपाल चौक में जमा होते हैं। वाले इस खेल से हजारों किसानों की आशा बंधी रहती है। ऐसी मान्यता है कि दड़ा यदि दूनी दरवाजे की तरफ जाता है तो आने वाले साल में बरसात अच्छी होती है और वह सुकाल का साल होता है, लेकिन यदि दड़ा अखनियां दरवाजे की तरफ जाता है तो आने वाला साल अकाल का साल माना जाता है।

फुटबॉल से मिलता-जुलता है

गौरतलब है कि रियासत काल से आवां कस्बे में दड़ा महोत्सव का आयोजन तत्कालीन राज परिवार की ओर से किया जाता रहा है। परंपरागत रूप से खेले जाने वाला दड़ा का खेल मौजूदा समय के फुटबॉल के खेल से मिलता जुलता है। खेलने वाले खिलाडिय़ों की तादाद हजारों में होती है। गांव के बीचोंबीच स्थित गोपाल चौक में खेले जाने वाले इस खेल में दो गोल पोस्ट अखनियां दरवाजा और दूनी दरवाजा होते हैं। इनकी दूरी लगभग एक किलोमीटर होती है।

सैनिकों की भर्ती को लेकर हुई थी शुरुआत

आवां के युवा सरपंच दिव्यांश महेंद्र भारद्वाज ने बताया कि राजस्थानी संस्कृति के प्रतीक इस अद्भुत खेल की शुरुआत एक शताब्दी पहले राव राजा सरदार ङ्क्षसह ने सेना में वीर योद्धाओं की भर्ती करने के लिए की थी, जो समय के साथ एक परम्परा के रूप में विकसित हो गई।

एक नजर में दड़ा

70 किलो वजन , 15 दिन पहले तैयारी, गांवों की होती
20 है भागीदारी, 3 हजार लोग होते
हैं खिलाड़ी, 10 हजार दर्शक
रहते हैं मौजूद