
कविता कोना- मन की चाह...
मन हुआ की ज़िन्दगी को दूसरों पर वार दें
आदमी है आदमी को आदमी का प्यार दें ।
वक़्त की पुकार है कि अब वतन संवार दें
इस चमन के रूप को हम नया निखार दें
हर उदास सी कली व फूल को उभार दें
पतझड़ी अभाव को बसंत की बहार दें ।
पिछड़ी बस्तियों को नए रंग से सिंगार दें
आदमी है आदमी को आदमी का प्यार दें ।।
कंटकों में ना रहे ज़िन्दगी इंसान की
सीखचों में ना कटे उम्र अब शबाब की
बाग़ हर लहक उठे हो आंधियॉं गुलाब की
आदमी को रात हर लगे मधुर विश्राम की ।
ज़िंदगी के चार दिन है फागुनी गुज़ार दें
आदमी है आदमी को आदमी का प्यार दें ।।
मजहबों की जैल में आज प्रीत कैद है
सीता और सलमा की चाह नजऱ कैद है
अर्थ एक ही हैं फिर भी भाषा में भेद है
यौवन के नयनों में शेष अभी खेद हैं
रंग कुछ खराब हैं तो मिलके सब सुधार दें
आदमी है आदमी को आदमी का प्यार दें ।।
दो दिलों के बीच में न धर्म की दीवार हो
आदमी है आदमी को आदमी से प्यार हो
हो भले गरीब कोइ चाहे जो अभाव हो
राम और रहीम में यहां न भेदभाव हो ।
एक रोटी हो तो आधी . आधी में गुज़ार दें
आदमी है आदमी को आदमी का प्यार दें ।।
नई उमर की नई फसल इस प्रयास में लगे
अब वतन का गाँव . गॉंव काश्मीर सा सजे
अर्धनग्न देह का घर राजमहल सा लगे
खंडहरों का रुप भी शाही महल सा लगे ।
उजड़ी टपरियों को भी स्वर्ग सा निखार दें
आदमी है आदमी को आदमी का प्यार दें ।।
ऐसा ना हो हम सुबह .शाम देखते रहें
आश्वासनों के खाली जाम देखते रहें
हुस्न के बाज़ार का नीलाम देखते रहें
चेहरे सब तमाम हों कि नाम देखते रहें ।
कल जिसे संवारना है आज ही संवार दें
आदमी है आदमी को आदमी का प्यार दें ।।
वक़्त की पुकार है कि जागते रहें सभी
नेताओं की आदतें बदल नहीं सकीं अभी
हवायें तो बदल गयीं असर हुआ नहीं अभी
भोर तो हुआ है मगर रौशनी नहीं अभी ।
रौशनी के वास्ते हम ज़िन्दगी को वार दें
आदमी है आदमी को आदमी का प्यार दें ।
मौलिक रचना
रचयिता .... पं हनुमान प्रसाद बोहरा 'मान
पालुकों का मोहल्ला , पुरानी टोंक
Published on:
29 Jun 2021 03:04 pm
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