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अपना समझ दुलारें हम..

बालक है अनमोल धरोहर, सच्चा यही खजाना है। चलता-फिरता निश्छल मंदिर, झलक-अलख की पाना है।।

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अपना समझ दुलारें हम..

अपना समझ दुलारें हम..

1.बालक है अनमोल धरोहर,
सच्चा यही खजाना है।
चलता-फिरता निश्छल मंदिर,
झलक-अलख की पाना है।।
2. इनकी प्यारी मोहनी-मूरत,
दिल से कभी निहारें हम।
नन्हें से प्यारे बच्चे को,
अपना समझ दुलारें हम।।
3.वंदन कर उगते सूरज के,
थोड़ा भीतर झाँकें हम।
पाना क्या ये, चाहते हमसे,
जाने और पहचाने हम।।
4.कोई चम्पा कोई चमेली,
बनने को बेताब हैं।
गुलाब, गेंदा और कमल सी
खुशबू की सौगात हैं।।
5.आदर,अपनत्व,प्रेम,
समपर्ण,
शिक्षा की बुनियाद है।
बिखरे खुशबू रोम-रोम से,
समझो, हुआ प्रभात है।।
6.शिक्षा, दीक्षा, संस्कारों से,
जीवन की बगिया महकाएं।
गौरव हो ये,देश धरा के,
आओ, ऐसा धर्म निभाएं।।

1.बालक है अनमोल धरोहर,
सच्चा यही खजाना है।
चलता-फिरता निश्छल मंदिर,
झलक-अलख की पाना है।।
2. इनकी प्यारी मोहनी-मूरत,
दिल से कभी निहारें हम।
नन्हें से प्यारे बच्चे को,
अपना समझ दुलारें हम।।
3.वंदन कर उगते सूरज के,
थोड़ा भीतर झाँकें हम।
पाना क्या ये, चाहते हमसे,
जाने और पहचाने हम।।
4.कोई चम्पा कोई चमेली,
बनने को बेताब हैं।
गुलाब, गेंदा और कमल सी
खुशबू की सौगात हैं।।
5.आदर,अपनत्व,प्रेम,
समपर्ण,
शिक्षा की बुनियाद है।
बिखरे खुशबू रोम-रोम से,
समझो, हुआ प्रभात है।।
6.शिक्षा, दीक्षा, संस्कारों से,
जीवन की बगिया महकाएं।
गौरव हो ये,देश धरा के,
आओ, ऐसा धर्म निभाएं।।

रचियता
प्रमोद स्वर्णकार
व्याख्याता
इतिहास
दूनीए टोंक