
सोप कस्बे में औषधीय खेती। फोटो: पत्रिका
Medicinal Farming Success: टोंक/सोप। पारंपरिक खेती में बढ़ती लागत और घटते मुनाफे के बीच टोंक जिले के सोप कस्बा क्षेत्र में औषधीय फसलों की खेती आय का मजबूत विकल्प बनकर उभरी है। किसान मोहनलाल नागर ने वैज्ञानिक सोच और नवाचार के साथ इस क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। उन्होंने स्वयं आर्थिक मजबूती हासिल की और अन्य किसानों को भी कम लागत में अधिक लाभ का मॉडल दिया।
9 अगस्त 2002 को उद्यम एवं प्रबंध विकास संस्थान जयपुर से औषधीय एवं सुगंधीय खेती का प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने सफेद मूसली, अश्वगंधा, आंवला और सतावर की खेती शुरू की। 24 जून 2003 को राजस्थान स्टेट मेडिसिन बोर्ड में पंजीकरण के साथ औपचारिक शुरुआत की।
उन्होंने राष्ट्रीय मेडिसिनल प्लाट बोर्ड को तीन लाख रुपए की परियोजना भेजी, जिस पर 30 हजार रुपए स्वीकृत हुए। लेकिन तकनीकी कारणों से राशि प्राप्त नहीं हो सकी। शुरुआती दौर में आंवले की फसल में नुकसान हुआ, फिर भी उन्होंने अश्वगंधा की खेती जारी रखी। जयपुर की पंसारी मंडी में 130 रुपए प्रति किलो के भाव से बिक्री ने नई दिशा दी।
वर्तमान में वे अश्वगंधा, स्टीविया, सफेद मूसली, काली हल्दी, चिया सीड्स और इरानी अकरकरा की लगभग 20 बीघा में खेती कर रहे है। प्रतिवर्ष करीब 25 लाख रुपए तक आय हो रही है। अब तक 500 से अधिक किसानों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। उत्कृष्ट कार्यों के लिए आयुष मंत्रालय ने स्वतंत्रता दिवस 2025 पर लाल किला नई दिल्ली में विशेष अतिथि के रूप में सम्मानित किया।
एक बीघा में अश्वगंधा की औसत पैदावार 4 से 5 क्विंटल सूखी जड़ होती है। बाजार भाव 6,000 से 8,000 रुपए प्रति क्विंटल रहने पर कुल आय 28,000 से 40,000 रुपए तक हो सकती है। लागत 12,000 से 15,000 रुपए तक आती है। उन्नत तकनीक और सीची बिक्री से लाभ 40,000 से 80,000 रुपए प्रति बीघा तक पहुंच सकता है। चार बीघा में यह मुनाफा 3 लाख रुपए तक हो सकता है।
मोहनलाल नागर ने औषधीय खेती का प्रशिक्षण लेकर योजनाबद्ध तरीके से कार्य शुरू किया। प्रारंभिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने फसल विविधीकरण अपनाया। गुरुकृपा हर्बल एग्रो फार्म की स्थापना कर किसानों को बीज, तकनीकी जानकारी और विपणन सहयोग उपलब्ध कराया। अब तक 500 से अधिक किसानों को प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाने में योगदान दिया।
Published on:
02 Mar 2026 11:59 am
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