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आवाज के दीवाने हैं लोग

'हर संग को ताबानी-ए-गोहर नहीं मिलती, हर शख्स को तकदीर-ए-सिकंदर नहीं मिलती, ये फलसफा-ए-जिंदगी है बज्मी, जिस चीज को चाहो कम्बख्त वो ही नहीं मिलती
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Shankar Sharma

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Updated: 10 Mar 2016, 10:40 PM IST

Tonk photo

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टोंक. 'हर संग को ताबानी-ए-गोहर नहीं मिलती, हर शख्स को तकदीर-ए-सिकंदर नहीं मिलती, ये फलसफा-ए-जिंदगी है बज्मी, जिस चीज को चाहो कम्बख्त वो ही नहीं मिलती। मशहूर शायर जेनुल साजेदीन बज्मी द्वारा लिखा गया ये शेर मेहंदीबाग निवासी आसिफ खान पर सटीक बैठता है।

वे बचपन से गीत-संगीत के शौकीन रहे और गाने की चाहत भी रखी, लेकिन उन्हें सही मंच नहीं मिल पाया। इसके बावजूद उन्होंने हौसला व गाने का रियाज जारी रखा। इसका नतीजा हैकि आज आसिफ खान की आवाज प्रदेश में गूंज रही है। वे जयपुर, कोटा, अजमेर समेत कई बड़े शहरों की महफिलों को अपनी आवाज से गुलजार कर चुके हैं। आसिफ ने मुकेश व किशोर के गानों को अपनी आवाज देकर लोगों को दीवाना बनाया है।

उनका कहना है कि वे मनचाहा मुकाम हासिल नहीं कर पाए, लेकिन गानों का शौक उन्हें आज भी पहचान दिलाए हुए है। आसिफ जब दस साल के थे तब से उन्हें गानों को शौक हो गया था। इसका रियाज घर में ही करने लगे। बाद में संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा जयपुर के मशहूर गजल गायक अहमद हुसैन, मोहम्मद हुसैन से मिली।

बीस साल की उम्र में आसिफ शहर में आयोजित कार्यक्रमों में गाने पेश करने लगे। धीरे-धीरे उनकी पहचान प्रदेशभर में होने लगी। अब उन्हें कई महफिलों में गाने के लिए बुलाया जाने लगा है। मुकेश व किशोर के गानों के लिए उनके पास बार-बार फरमाइश आती है। वे कहते हैं कि 'तू कहीं भी रहे, तेरे सिर पर इल्जाम तो है, तेरे हाथों की लकीरों में मेरा नाम तो हो' शेर भी उनकी जिंदगी को बयां करता है।

आसिफ का कहना है कि उन्हें मनचाहा मुकाम नहीं मिला, लेकिन उनकी आवाज को लोग पसंद करते हैं। वर्ष 1988 में जयपुर के रविन्द्र मंच पर आयोजित अखिल भारतीय गायन प्रतियोगिता में आसिफ खान पांचवें स्थान पर रह चुके हैं। उन्हें देश के विख्यात संगीतकार रविन्द्र जैन ने सम्मानित किया था।