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बीमारियां बांट रहा स्मार्ट फोन, बच्चों पर पड़ रहा है दुष्प्रभाव

बाल व मनोरोग विशेषज्ञों का मानना है कि खाने-पीने, खेलने के स्थान पर बच्चे घंटों स्मार्ट फोन व लेपटॉप से चिपके रहते हैं। इससे एडिक्शन बढ़ता जा रहा है।

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स्मार्ट फोन व लेपटॉप का  दुष्प्रभाव

बाल व मनोरोग विशेषज्ञों का भी मानना है कि आधुनिक उत्पादों का सर्वाधिक दुष्प्रभाव किशोरवय पर पड़ रहा है।

टोंक. वर्तमान की भागमभाग जिंदगी को आसान बनाने में स्मार्ट फोन, लेपटॉप, कम्प्यूटर आदि जिदंगी का अहम हिस्सा भले ही बन गए, लेकिन इनके दुष्प्रभाव भी सामने आ रहे हैं। बाल व मनोरोग विशेषज्ञों का भी मानना है कि आधुनिक उत्पादों का सर्वाधिक दुष्प्रभाव किशोरवय पर पड़ रहा है।

खाने-पीने, खेलने के स्थान पर बच्चे घंटों स्मार्ट फोन व लेपटॉप से चिपके रहते हैं। इससे एडिक्शन बढ़ता जा रहा है। एक दशक पहले तक मोबाइल फोन से महज बात की जाती थी, लेकिन वर्ष 2010 के बाद आए बदलाव ने लोगों की आदत बदल दी।

वर्ष 2010 के बाद बाजार में कई कम्पनियों के एंड्रॉइड फोन आए और उनमें इंटरनेट की सुविधा बढ़ी। इसके साथ ही फेसबुक, वाट्सएप समेत अन्य एप भी उपलब्ध हुए। इन्हें देखने के लिए खास तौर पर युवा दिन भर लगा रहता है। दोस्त से बात करनी हो या किसी का फोटो या वीडियो मंगवाना हो, ये आसान हो गया।


दोस्तों के मौज मस्ती व कई तरह के डाउनलोड ने युवाओं में लत डाल दी। हालात यह हो गए हैं कि खाना खाने, पढ़ाई या घर का अन्य काम करने से पहले लोग मोबाइल पर आने वाले मैसेज को जरूर देखते हैं। कई बार तो गु्रप में जवाब देते-देते कई घंटे गुजर जाते हैं।

व्यायाम व खेलने के लिए करें प्रेरित
सायबर विशेषज्ञों का कहना है कि 14 वर्ष से अधिक आयु के किशोर में स्मार्ट फोन पर कई चीजे देखने व जाने की जिज्ञासा रहती है। ऐसे में वह गलत साइटों पर विजिट करना शुरू कर देते हैं। समय के साथ यह उनकी लत बन जाती है।

ऐसे में वह परिवारजनों की ओर से कही गई बातों को अनुसना कर समय-बेसमय मोबाइल फोन चलाने में रूचि लेने लगते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि अभिभावक उन्हें व्यायाम व खेलने के लिए प्रेरित करें। जिससे कि उनका तन व मन स्वस्थ्य रह सके।


जहां देखो उसके हाथ में है

स्मार्ट फोन आज शहर में ही नहीं गांवों में आम जरूरत की वस्तु बन गए हैं। जिले के 80 प्रतिशत से अधिक युवाओं के पास स्मार्ट फोन है। लगभग सभी युवा ही नहीं आज बच्चे भी वाट्सएप तथा फेसबुक का उपयोग करने लगे हैं।

हद तो यह है कि बच्चे और युवा मोबाइल में इतने मशगूल रहने लगे हैं कि उन्हें खाने-पीने का भी ध्यान नहीं रहता है। गांव-कस्बे व शहर में घटना होते ही सबसे पहले वाट्सएप गु्रप पर डाली जा रही है। परिजनों को कुछ काम कराना हो तो युवा कुछ देर के लिए टाल तक देते हैं।

जरूरत पडऩे पर मोबाइल को ही साथ ले जाकर बातें करते रहते हैं। आलम यह है कि उन्हें समय का भी ध्यान नहीं रह पाता। इससे सडक़ दुर्घटनाओं का भी ग्राफ दिनों दिन बढ़ रहा है।

स्मार्ट फोन व लेपटॉप का अधिक उपयोग कने से बच्चों में नींद नहीं आने, आंख, कान में जलन, कमजोरी आदि की समस्या बढ़ जाती है। इसके अलावा फोन बंद करने के बाद आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है। कई बार तो धुंधला भी नजर आने लगता है।


राजीव बंसल, बालरोग विशेषज्ञ, टोंक।
बालकों का अधिक देर तक स्मार्ट फोन का उपयोग हानिकारक है। इससे याददाश्त में कमी के साथ कमजोरी आती है। ऐसे बालक परिजनों से दूर रहने का प्रयास करते हुए एकांकीपन पसंद करते हैं।

बालकों का अपराधों में शामिल होने के एक बड़ा कारण भी इन्टरनेट ही है। ऐसे में 10 से 18 वर्ष तक के किशोर को अभिभावक यह सुविधा उनकी देखरेख में दें।
सी. पी. बैरवा, मनोरोग विशेषज्ञ सआदत अस्पताल टोंक।


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