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50 लाख खर्च कर 600 साल पुराने मंदिर को संवारा

महाराणा प्रताप के समय ठाकुर जी मंदिर पर चढ़ाई थी ध्वजा

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50 लाख खर्च कर 600 साल पुराने मंदिर को संवारा

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नागर शैली में बना यह मंदिर उदयपुर स्थापना से पूर्व का है
मेनार (उदयपुर). मेवाड़ में विरासत के संरक्षण, संवद्र्धन और जीर्णोद्धार की परम्परा सदियों पुरानी है। अपनी विरासत को संजोए रखना, उनकी सार संभाल करना भले ही सरकारें भूल गई लेकिन इनसे जुड़े लोग इन्हें संभाल रहे हैं। मेनारवासियों ने अपनी विरासत को संजोए रखने और आत्मनिर्भरता की मिसाल कायम की है। मेनार के लोगों ने समय के साथ साथ मूलभूत सुविधाओ को सामूहिक प्रसासों से अपने स्तर पर विकसित किया है चाहे वो धार्मिक स्थल हो, सरोवर, शिक्षा भवन, चिकित्सा भवन या फिर सार्वजनिक भवन हो, सभी जनसहभागिता, भामाशाहों एवं जनसहयोग की बदौलत अस्तित्व में आए हैं। अब प्राचीन विरासत को संजोने का अनूठा कार्य भी इसमें जुड़ गया है। मेनार में 5 साल पूर्व ग्रामीणों ने प्राचीन विरासत 600 साल पुराने ठाकुर जी मन्दिर को जर्जर होने से बचाने का जिम्मा उठाया था जो अब साकार हो गया है। मेनार कस्बे के मध्य पहाड़ी पर स्थित करीब 600 साल पुराने ठाकुर जी कृष्ण मन्दिर मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य पूरा हो चुका है। इस मंदिर की नींव करीब 600 वर्ष पूर्व रखी गई थी। जिसे बनाने मे 97 वर्ष लगे थे। नागर शैली में बना यह मंदिर उदयपूर स्थापना से पूर्व का है।

जर्जर होने लगा तो ग्रामीणों ने उठाया जिम्मा
गांव का प्राचीन मंदिर जब जर्जर होने लगा तो ग्रामीणों ने इसके जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया। मंदिर के हर जर्जर पत्थर को बदला गया। शिखर का निर्माण, भव्य द्वार, चबूतरा निर्माण, गर्भ गृह, सहित पूरे मन्दिर में सफेद मार्बल का पत्थर लगाकर नवीन रूप दिया गया है। लगभग 4 वर्ष में मन्दिर मरमत का कार्य पूरा हो पाया है। ग्रामीणों द्वारा करीब 50 लाख रुपए तक खर्च कर इस प्राचीन धरोहर को संजोने का प्रयास किया है। मंदिर निर्माण में खर्च हुई राशि ग्राम स्तर पर ही जनसहयोग, सामूहिक आयोजनों आदि से एकत्रित की गई है ।

राणा लाखा के समय बना मन्दिर, 97 वर्ष लगे
दो सरोवरों एवं गांव के बीचोंबीच ऊंची पहाड़ी पर स्थित इस कृष्ण मन्दिर (ठाकुर जी मन्दिर) को बनने मे 97 साल लगे थे। 1320 के आसपास इस मंदिर निर्माण का मुहर्त कर नींव रखी गई जो 97 साल बाद जाके राणा लाखा के समय पूर्ण हुआ था ।

मेनार ठाकुरजी मंदिर प्राचीन है। यहां मैंने 1982 में मंदिर के पास बने सूरह लेख पढ़ा था जिसपर मंदिर के ध्वजा चढ़ाई का उल्लेख मिलता है जिसमें सन 1596 में महाराणा प्रताप के समय मंदिर पर ध्वजा चढ़ाने का जिक्र मेवाड़ी भाषा में लिखे जर्जर अभिलेख पर मिलता है ।
डॉ. श्री कृष्ण जुगनू, मेवाड़ के इतिहासकार एवं लेखक