
मोर जैसी ध्वनि ने बनाया मोरचंग, गोह के चमड़े से गूंजता है गोवा का यह यंत्र
उदयपुर. art work shop भारत के लोक वाद्यों की कथा भी अनूठी और विलक्षण है। कुछ को कलाकार खुद बनाता है और खुद बजाता है। कुछ घर के आस-पास की वाद्ययंत्रों को सहज कर रखते हैं। पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र की ओर से शिल्पग्राम में आयोजित 'लोक और आदिवासी वाद्य यंत्र कार्यशालाÓ में आए वादकों के मुंह से ऐसे ही उद्गार निकलते हैं।
शिल्पग्राम के दर्पण सभागार में चल रही एक सप्ताह की कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा केन्द्र शासित प्रदेश सिलवासा में प्रचलित लोक व जनजातीय वाद्य यंत्रों का प्रलेखन करना, जिसमें दुर्लभ और विलुप्त वाद्यों को भी शामिल किया गया है। विलुप्त वाद्यों में राजस्थान के थार अंचल के जैसलमेर का वाद्य है ''नड़ÓÓ। अस्सी के दशक में करण भील जिस वाद्य को बजाता था। आज उसके बजाने वाले नहीं के बराबर हैं। नड़ बांसुरीनुमा वाद्य है, जिसमें कलाकार अपने कंठ से ध्वनि निकालने के साथ उसे नड़ की आवाज़ से मिलाते हुए बजाता है। साज और मनुष्य के सुरों का यह अनूठा सम्मिश्रण है।
मरू अंचल में ही लोहे का एक छोटा सा वाद्य है मोरचंग, जिसके होठों से लगते ही एक मधुर और आनन्दित करने वाला स्वर निकलता है। मोर जैसी ध्वनि होने के कारण इसे मोरचंग कहा गया। रेगिस्तान में चरवाहों की ओर से पशुओं को नियंत्रित करने तथा खुद के मनोरंजन के लिए इसका उपयोग होता है।
अरब सागर के तट पर बसे गोवा का मिट्टी से बना 'घुम्मटÓ बनावट और धमक से अलग पहचान देता है। मृदा पात्र के ऊपरी मुख पर गोह का चमड़ा लगाते हंै। गुजरात और महाराष्ट्र के सीमावर्ती अंचल में रहने वाले आदिवासियों की ओर से बोहाड़ा में प्रयोग में लाया जाने वाला पावरी की बनावट आकर्षक है। art work shop लौकी के तुंबे और मोरपंख, बांस से बनाई जाने वाली पावरी तकरीबन 4 से 5 फीट की होती है।

Published on:
20 Sept 2019 06:00 am
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