13 मई 2026,

बुधवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

उदयपुर के जंगलाें में विलुप्त हुए गिद्धों की वापसी, उडन गिलहरी भी खूब

फुलवारी की नाल क्षेत्र सबसे समृद्ध वन क्षेत्र बनकर उभरा है, जहां तेंदुए समेत कई दुर्लभ वन्यजीवों की अच्छी संख्या मिली है। हालांकि वन्यजीव गणना में इस बार भी बाघ, भेड़िया, पैंगोलिन और फिशिंग कैट जैसी दुर्लभ प्रजातियां नहीं मिलीं, जिससे चिंता बनी हुई है।

3 min read
Google source verification
indian vulture

वन्यजीव गणना में नजर आया गिद्ध, इस बार इनकी जंगलों में वापसी हुई है

उदयपुर. मेवाड़ के जंगलों से इस बार ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने वन्यजीव प्रेमियों और वन विभाग की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुका लंबी चोंच वाला भारतीय गिद्ध फिर उदयपुर के जंगलों में दिखाई दिया है। इसके साथ ही चौसिंगा, उड़न गिलहरी और दुर्लभ वन्यजीव प्रजातियों की बढ़ती मौजूदगी ने मेवाड़ के जंगल फिर से सांस लेने के संकेत दिए हैं। वर्ष 2026 की वन्यजीव गणना में उदयपुर वन्यजीव परिक्षेत्र के जंगलों में वन्यजीवों की गतिविधियां पिछले वर्षों की तुलना में अधिक दर्ज हुई हैं। फुलवारी की नाल, जयसमंद, सज्जनगढ़ और बाघदरा मगरमच्छ संरक्षण रिजर्व में गणना में जैव विविधता की समृद्ध तस्वीर सामने आई है।

दो दशक से गिरावट आई थी गिद्ध की

वन्यजीव गणना में सबसे बड़ा और सकारात्मक संकेत लंबी चोंच वाले भारतीय गिद्ध की मौजूदगी रहा। फुलवारी की नाल क्षेत्र में इस संकटग्रस्त प्रजाति के 11 गिद्ध दर्ज किए। यह वही गिद्ध प्रजाति है जिसकी संख्या देशभर में तेजी से घट चुकी है और जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर संकटग्रस्त श्रेणी में रखा है। विशेषज्ञों के अनुसार, गिद्ध सिर्फ पक्षी नहीं, बल्कि जंगल और पर्यावरण की सेहत का सबसे बड़ा संकेतक माना जाता है। गिद्ध मृत पशुओं को खाकर जंगल और गांवों को संक्रमण से बचाते हैं। दो दशकों में दवाइयों के दुष्प्रभाव, जहरीले अवशेष और प्राकृतिक आवास खत्म होने से गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट आई थी। ऐसे में उदयपुर के जंगलों में इनका दोबारा दिखना संरक्षण प्रयासों की सफलता माना जा रहा है। वन अधिकारियों का कहना है कि फुलवारी की नाल के शांत पहाड़ी क्षेत्र, ऊंचे पेड़ और कम मानवीय हस्तक्षेप गिद्धों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर रहे हैं।

Read this : सोने की खरीद पर ब्रेक! उदयपुर के सर्राफा बाजार में बढ़ी चिंता, रिसाइक्लिंग और लाइटवेट ज्वेलरी का ट्रेंड तेज

फुलवारी की नाल बना वन्यजीवों का सबसे सुरक्षित ठिकाना

पूरे उदयपुर वन्यजीव परिक्षेत्र में फुलवारी की नाल सबसे समृद्ध वन क्षेत्र बनकर उभरा है। यहां तेंदुए, जरख, उड़न गिलहरी, चौसिंगा और जंगली बिल्ली जैसी कई महत्वपूर्ण प्रजातियों की अच्छी मौजूदगी दर्ज हुई। गणना के अनुसार, जंगल में सियार-गीदड़ 193,लोमड़ी-109, उड़न गिलहरी- 76, जंगली बिल्ली-70, जरख (हाइना)-51, स्लॉथ बियर- 35, कबर बिज्जू (रेटल)-38, चौसिंगा- 35, जंगली मुर्गा-170, लंबी चोंच वाले भारतीय गिद्ध की 11 संख्या दर्ज की गई। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार चौसिंगा और उड़न गिलहरी जैसी प्रजातियां केवल उसी जंगल में पनपती हैं जहां प्राकृतिक संतुलन मजबूत होता है। उड़न गिलहरी का मिलना इसका संकेत है कि जंगलों में बड़े और पुराने वृक्ष अब भी सुरक्षित हैं।

तेंदुए खूब, लेकिन बाघ अब भी गायब

पूरे उदयपुर वन्यजीव परिक्षेत्र में 57 तेंदुए दर्ज किए गए। इनमें फुलवारी की नाल और जयसमंद दोनों क्षेत्रों में 25-25 तेंदुए पाए गए। सज्जनगढ़ में 5 और बाघदरा मगरमच्छ संरक्षण रिजर्व में 2 तेंदुए दर्ज हुए। हालांकि वन्यजीव गणना में एक भी बाघ की मौजूदगी नहीं मिली। इससे स्पष्ट है कि क्षेत्र अभी बाघों के स्थायी आवास के रूप में विकसित नहीं हो पाया है।

Read this Rajasthan: एक लाख रुपए रिश्वत लेते जीपीएफ का वरिष्ठ सहायक गिरफ्तार, डेथ क्लेम पास करने की एवज में मांगे थे डेढ़ लाख

जयसमंद में मिले खूब शाकाहारी वन्यजीव

जयसमंद क्षेत्र में शाकाहारी वन्यजीवों की अच्छी संख्या सामने आई। यहां नीलगाय- 343, जंगली सूअर- 388, चीतल- 63, सांभर- 17 दर्ज किए। वन विभाग के अनुसार, जल स्रोतों की उपलब्धता और घना वन क्षेत्र यहां वन्यजीवों के लिए अनुकूल वातावरण बना रहा है। पूरे वन्यजीव परिक्षेत्र में सबसे अधिक संख्या लंगूरों की रही। कुल 1785 लंगूर दर्ज किए गए। इसके अलावा जंगली सूअर- 515, नीलगाय-401,रोही-166, चीतल- 79, सांभर- 22, चिंकारा-10, चौसिंगा- 35 दर्ज किए गए।

कई दुर्लभ प्रजातियां अब भी नहीं मिलीं

गणना में जहां कई सकारात्मक संकेत मिले, वहीं कुछ दुर्लभ प्रजातियों की अनुपस्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। बाघ, भेड़िया, पैंगोलिन, फिशिंग कैट, मरु बिल्ली, सियागोश और गाेंडावण जैसे वन्यजीवों की मौजूदगी दर्ज नहीं हुई। वन विभाग का कहना है कि लगातार गश्त, अवैध शिकार पर नियंत्रण, जल स्रोत विकास और जंगल संरक्षण के कारण वन्यजीवों की स्थिति में सुधार दिख रहा है। आने वाले वर्षों में संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण पर विशेष फोकस किया जाएगा।