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VIDEO: प्राकृतिक खेती उन्ही स्थानों पर की जाएगी जहां पर कम संसाधन: डा: शर्मा

प्राकृतिक खेती यानी प्रकृति के अनुकूल खेती करना। वर्तमान में प्राकृतिक खेती भारत सरकार की प्राथमिकता में हैं। इसको लेकर सरकार की ओर से पाठ्यक्रम भी तैयार किया जा रहा है। जिससे बीएससी ऑनर्स के छात्र इसके बारे में जान सकेंगे।

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VIDEO: प्राकृतिक खेती उन्ही स्थानों पर की जाएगी जहां पर कम संसाधन: डा: शर्मा

VIDEO: प्राकृतिक खेती उन्ही स्थानों पर की जाएगी जहां पर कम संसाधन: डा: शर्मा

मधुसूदन शर्मा

उदयपुर. प्राकृतिक खेती यानी प्रकृति के अनुकूल खेती करना। वर्तमान में प्राकृतिक खेती भारत सरकार की प्राथमिकता में हैं। इसको लेकर सरकार की ओर से पाठ्यक्रम भी तैयार किया जा रहा है। जिससे बीएससी ऑनर्स के छात्र इसके बारे में जान सकेंगे। वर्तमान में रासायनिक खादों, दवाइयों के बढ़ते उपयोग से किसानों का खेती में खर्च बढ़ा है। ऐसे में देश के किसान प्राकृतिक खेती या शून्य बजट नेचुरल फार्मिंग अपनाकर काम करें तो इसके बेहतर परिणाम सामने आएंगे। प्राकृतिक खेती में कोई इनपुट बाजार से नहीं खरीदना होता बल्कि इसकी व्यवस्था स्वयं खेत या यूं कहें की प्रकृति से ही इसकी पूर्ति की जाती है। आंध्रप्रदेश पहले से प्राकृतिक खेती कर रहा है। यहां पर कम लागत में बेहतर उत्पादन सामने आ रहा है। इन सब मुद्दों को लेकर प्रस्तुत है सहायक महानिदेशक मानव संसाधन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के डॉ. एसके शर्मा से पत्रिका से बातचीत के प्रमुख अंश।

पत्रिका: प्राकृतिक खेती को किस दृष्टि से लिया जा रहा है।

जवाब: वर्तमान में उपभोक्ता व जनता में पेस्टीसाइड फ्री कृषि उत्पाद की चाहत के कारण इस खेती की मांग बाजार में बढी। क्योंकि पेस्टीसाइड से उत्पादन होने वाले उत्पादों का असर मानव जीवन के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। नई-नई बीमारियां जन्म ले रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए लोग अब प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं।

पत्रिका: उत्पादन कम मिलने के पीछे वजह क्या है।
जवाब: खेती में बार-बार फर्टिलाइजर, पेस्टीसाइड का उपयोग किया जा रहा है। जिससे जमीन कमजोर हो रही है। ऐसे में प्रति इकाई आदान उपयोग करने के बावजूद उत्पादन कम हो रहा है। 13 किलोग्राम चावल का उत्पादन करने के लिए एक केजी एनपीके का उपयोग करते हैं। उसी से मात्र साढ़े पांच किलोग्राम चावल का उत्पादन मिल रहा है। ऐसे में खेती की उत्पादकता पर असर पड़ा है। दूसरा कारण ये है कि सोयल में कार्बन है और सूक्ष्म जीवों की संख्या धीरे-धीरे कम हो रही है। जिससे उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है।

पत्रिका: बिना कैमिकल की खेती कैसे संभव है। इसे कैसे किया जा सकता है।
जवाब: प्राकृतिक खेती के लिए हमारे वैज्ञानिक, शिक्षकों को प्रशिक्षण देकर तैयार किया जा रहा है। इसी को लेकर प्राकृतिक खेती शुरूआत की गई है। इसमें देश के 15 लाख किसानों को प्रशिक्षण देंगे। ये किसान और 15 लाख को प्रशिक्षण देंगे। ऐसे में ये संख्या 30 लाख का आंकड़ा छूएगी। इससे किसान बिना कैमीकल की खेती की ओर अग्रसर होगा।

पत्रिका: जैविक खेती व प्राकृतिक खेती में क्या अंतर है।
जवाब: ये दोनों खेती एक तरह से एक ही मानी जाती है। लेकिन एक सिरे पर दोनों में अंतर आ जाता है। जैविक खेती में किसान जैविक मानकों के आधार पर किसी संस्थान में रजिस्ट्रेशन करवाकर प्रमाण पत्र लेता है। लेकिन प्राकृतिक खेती में इसकी जरूरत नहीं है। वह अनुभव के आधार खेती करता है। जैविक खेती के लिए किसान बाहर से लाखों का सामान खरीदकर खेती करता है। लेकिन प्राकृतिक खेती करने वाला किसान खेत से ही उत्पाद लेगा और खेती करेगा।

पत्रिका: रासायनिक उर्वरकों की बजाय प्राकृतिक खेती कितनी कारगर है।

जवाब: प्राकृतिक खेती हमारे पंचभूत, जल, जमीन, आकाश, वायु, पानी के लिए भी लाभदायक है। ये स्वस्थ रहेगी तो इसका लाभ सबको मिलेगा। कैमिकल फार्मिंग भी आज की जरूरत है क्योंकि पूरे देश में प्राकृतिक व जैविक खेती नहीं की जा सकती है। क्योंकि इस देश में जनसंख्या सबसे बड़ी समस्या है। प्राकृतिक खेती उन्ही स्थानों पर की जाएगी जहां पर कम संसाधन हैं।

पत्रिका: वातावरण में बदलाव खेती के लिए बड़ा चैलेंज है। इसे कैसे बेहतर बनाया जा सकता है।
जवाब: खेती में धीरे-धीरे खेती में उत्पादक में लागत बढऩे लगी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वातावरण बदलाव बड़ा मुद्दा है। अगर हम फर्टिलाइजर, पेस्टी साइड, इंटेसिव कल्टीवेशन करेंगे तो भूमि का तापमान बढ़ेगा। इसको देखते हुए प्राकृतिक खेती करने के तरीकों पर रिसर्च की जरूरत पड़ी और इस पर काम शुरू किया गया है।

पत्रिका: क्या है जीरो बजट फार्मिंग।
जवाब: ये खेती महाराष्ट्र, हिमाचल, गुजरात में चल रही है। इन प्रदेशों में खेती में देशी तरीके अपनाए जा रहे हैं। पहले यहां किसान दिवामृत, बिजामृत, आच्छादन पद्धति से खेती करते आ रहे हैं। ये प्राकृतिक खेती के तरीके थे। भारत सरकार ने छोटे किसानों को इससे जोड़ने की सोची और खेती की इन स्वीकृत पद्धतियों के साथ खेती करने पर बल दिया।