
फागुन मास शुरू हो चुका है। एक ओर जहां प्रकृति में फागुनी छटा दिखने लगी है, वहीं कृष्ण मंदिरों में फागोत्सव की धूम भी शुरू हो चुकी है। वहीं, फागुन में पहने जाने वाली विशेष फागणिया के रंग भी दिखने लगे हैं। दरअसल, मेवाड़ की परंपरा के अनुसार फागुन में फागणिया पहनने का रिवाज है। महिलाएं सफेद-लाल व पीले रंगों की साडि़यों में नजर आने लगी हैं। शहर के बाजारों में विशेष रूप से सफेद, लाल, पीले रंग की साड़ी और राजपूती पोशाकें सज चुकी हैं।
मेवाड़ की परंपरा रही है कि महिलाएं होली के अवसर पर पीले, सफेद व लाल रंग की पीलिया व फागणिया ड्रेस पहनती हैं। विवाहित बेटी के पहला लडक़ा या लडक़ी होने पर ढूंढ़ आदि के मौके पर पीहर से ससुराल पीलिया या फागणिया साड़ी भेजी जाती है, जो माता-पिता की तरफ से शुभकामनाओं का प्रतीक होती है। इस बार बाजार में कई तरह की नई डिजाइन की साड़ियां उपलब्ध हैं। इसमें गोटा पत्ती हैंड वर्क, सिल्क साटन के साथ ही ऑर्गेनजा की 300 से लेकर 3,000 रुपए तक की आकर्षक डिजाइन की साड़ियां उपलब्ध हैं
ऋतु आधारित परिधान की परंपरा
इतिहासकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार राजस्थान में वस्त्र-प्रसंग में यह बात विशेष रूप से याद आती है कि यहां ऋतु आधारित परिधान की परंपरा रही है। कोई दो सौ साल पहले लिखी "कपड़ कुतूहल" में इस मान्यता पर जोर है कि रुचि की अनुकूलता पर ऋतु का प्रभाव होता है। फागुन में फबते फागणिया परिधान को ओढ़ने की परंपरा है। ऐसा माना जाता है कि जब तक बहू पर सासरे का रंग पूरा न चढ़ जाए, तब तक तरह-तरह के रंग चढ़ाए जाते हैं। पीहर का पीला, मामैरा का कोरजल्या, बुआ की बुरलिया-ओढ़नी, जेठाणी का जेठा वेश और ननद का ननदिया नांदना, भतीजा-भतीजी होने पर ढूंढ की रस्म का रुचिकर वेश भी यही है।
मंदिरों में चंग की थाप पर होली के गीत
डॉ. जुगनू ने बताया कि इसी परंपरा ने श्रीनाथजी के मंदिर में फाग की पिछवाई को कोरा रखा है, ताकि पूजा कीर्तन में उड़ाई गई गुलाल और अबीर के छांटे छप्पनी छटा दे सके। शहर के जगदीश मंदिर व श्रीनाथजी की हवेली में भी फाग के गीत शुरू हो चुके हैं। फागुन के पूरे महीने में ठाकुरजी की गुलाल की सेवा होती है। इसी के साथ ठाकुरजी का विशेष शृंगार भी किया जाता है। भक्त फाग के गीत गाते हैं, अबीर-गुलाल उड़ाए जाते हैं। यह क्रम रंग पंचमी तक जारी रहता है।
Published on:
03 Mar 2024 04:03 pm
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