
file photo
उदयपुर. करोड़ों की सरकारी जमीन पर कब्जे के लिए कैसे फर्जी दस्तावेज तैयार किए जा रहे हैं, इसका सनसनीखेज खुलासा उदयपुर विकास प्राधिकरण (यूडीए) की जांच में हुआ है। मामला शिल्पग्राम के पीछे हवालाखुर्द क्षेत्र की जमीन का है। यूडीए को यहां एक ऐसा पट्टा मिला, जो पहली नजर में पूरी तरह सरकारी रिकॉर्ड जैसा था। उपखंड अधिकारी की सील, हस्ताक्षर, पत्रावली संख्या, पट्टा नंबर, भूमि रूपांतरण शुल्क और गवाहों के हस्ताक्षर तक दर्ज थे। इसी कथित पट्टे के आधार पर एक व्यक्ति ने सरकारी जमीन पर दो मंजिला मकान तक खड़ा कर दिया। लेकिन जब यूडीए ने दस्तावेज की गहराई से जांच करवाई तो पूरा मामला फर्जीवाड़े का निकला। अब यूडीए इस मामले में कोर्ट को रिपोर्ट भेजकर संबंधित व्यक्ति के खिलाफ एफआइआर दर्ज करवाने की तैयारी कर रहा है।
कथित पट्टा देख कार्रवाई रोकनी पड़ी
यूडीए 2 जून को हवालाखुर्द में कार्रवाई के लिए पहुंचा तो वहां सरकारी जमीन पर दो मंजिला मकान मिला। स्थानीय वेनसिंह पुत्र किशोरसिंह ने 12 जनवरी 1988 का पट्टा पेश किया। इसमें पत्रावली संख्या 16/88 और पट्टा नंबर 77 दर्ज था। दस्तावेज में खसरा नंबर 735 की 0.0372 हेक्टेयर यानी करीब 444 वर्गगज (लगभग 4000 वर्गफीट) भूमि आवासीय प्रयोजन के लिए आवंटित होना दर्शाया गया था। साथ ही 1500 रुपए भूमि रूपांतरण शुल्क 4 जनवरी 1988 को जमा करवाना भी उल्लेखित था। पट्टे में उपखंड अधिकारी भूमि रूपांतरण शाखा के हस्ताक्षर, कार्यालय की सील तथा दो गवाहों के हस्ताक्षर भी दर्ज थे। दस्तावेज इतना वास्तविक प्रतीत हो रहा था कि अतिक्रमण हटाने पहुंची टीम ने पहले चरण में कार्रवाई रोक दी।
फाइल ने खोला राज
मामले में संदेह होने पर यूडीए सचिव ने जिला कलक्टर कार्यालय के अभिलेखागार से पत्रावली संख्या 16/88 की मूल फाइल तलब की। जब रिकॉर्ड सामने आया तो पूरा खेल खुल गया। अभिलेखागार से वर्ष 1988 की मूल पत्रावली में वेनसिंह नाम का कोई आवेदक था ही नहीं। फाइल में आवेदक के रूप में मंजूदेवी पत्नी दिनेश कुमार चेचाणी का नाम दर्ज मिला। उस पत्रावली में कोई पट्टा जारी नहीं किया गया था बल्कि तहसीलदार की रिपोर्ट पर आवेदन खारिज कर दिया गया था। यूडीए को आवेदन खारिज करने से जुड़े दस्तावेज की प्रमाणित प्रतियां भी उपलब्ध करवाईं। इससे स्पष्ट हो गया कि उक्त पट्टा सरकारी रिकॉर्ड से मेल नहीं खा रहा और कथित तौर पर फर्जी तरीके से तैयार किया गया था।
... तो चली जाती करोड़ों की जमीन
जांच में सामने आया कि फर्जी पट्टा बनाने वालों ने केवल साधारण दस्तावेज नहीं बनाए, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड की तर्ज पर पत्रावली संख्या, पट्टा नंबर, खसरा विवरण, शुल्क, गवाह, सील और हस्ताक्षरों तक की नकल कर दी। अधिकारियों का मानना है कि यदि मूल रिकॉर्ड की जांच नहीं होती तो यह जमीन हमेशा के लिए निजी स्वामित्व में चली जाती। यूडीए अधिकारियों के अनुसार अब पूरे क्षेत्र में ऐसे अन्य दस्तावेज की भी जांच करवाई जा रही है। आशंका है कि जमीनों पर कब्जे के लिए और भी कई फर्जी पट्टे ऐसे हो सकते हैं।
70 करोड़ की जमीन पर चला था बुलडोजर
हवालाखुर्द का यह वही क्षेत्र है जहां 2 जून को यूडीए ने कार्रवाई करते हुए 70 करोड़ रुपए मूल्य की सरकारी भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया था। शिल्पग्राम-हवाला क्षेत्र की इस प्राइम लोकेशन पर लंबे समय से भूमाफिया की नजर थी। बड़े भूखंडों पर कब्जे पाए गए थे और कुछ पुलिसकर्मियों के नाम भी सामने आए थे, जिन्होंने वहां संपत्तियां ले रखी थीं। कई लोगों ने 5 हजार से 10 हजार वर्गफीट तक के भूखंडों पर कब्जा कर पक्की बाउंड्रीवाल खड़ी कर दी। तीन व्यक्तियों ने बड़े मकान बना लिए, जबकि कुछ लोग भविष्य में रिसोर्ट, विला और व्यावसायिक प्रोजेक्ट विकसित करने की तैयारी कर रहे थे।
Updated on:
18 Jun 2026 06:06 pm
Published on:
18 Jun 2026 06:05 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
