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चिकित्सा माफिया के आगे लाचार सरकार

उदयपुर में संभाग मुख्यालय पर सक्रिय चिकित्सा माफिया पर नियंत्रण अफसरों के बूते से बाहर

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Government helpless before the medical mafia

चिकित्सा माफिया के आगे लाचार सरकार

उदयपुर में जिला प्रशासन की नाक के नीचे एक और अवैध निजी चिकित्सालय संचालित होता पाया गया। लगभग छह माह में यह दूसरा मौका है, जब बगैर पंजीयन और आवश्यक मंजूरियों के अस्पताल खोलकर आमजन की सेहत से खुले खिलवाड़ का चिंताजनक मामला सामने आया है। एक ओर लोगों की जिंदगी से खेल तो दूसरी तरफ गरीब-मजबूरों को फंसाकर उनसे हो रही लूट को रोक पाने में शासन-प्रशासन लाचार साबित हो रहा है।

दरअसल उदयपुर में संभाग मुख्यालय पर सक्रिय चिकित्सा माफिया पर नियंत्रण अफसरों के बूते से बाहर है। सरकारी अस्पतालों से लेकर निजी पैथोलॉजी लैब और अस्पतालों तक एक प्रकार का गिरोह सक्रिय है। जो आरएनटी मेडिकल कॉलेज जैसे चिकित्सा संस्थान की उत्कृष्ट चिकित्सा सेवाओं में कोई न कोई नुस्ख बताकर रोगियों को निजी अस्पतालों में पहुंचा रहे हैं। जहां रोगियों से उपचार के नाम पर खुली लूूट हो रही है। गरीब और मध्यम वर्गीय लोग अपने परिजनों के उपचार के लिए जैसे तैसे धन का इंतजाम करते हैं। ऐसे मामले में दलालों के अलावा सरकारी चिकित्सा संस्थानों से जुड़े कार्मिकोंं की संलिप्ततता भी उजागर हो चुकी है, लेकिन सख्त कार्रवाई के अभाव में हर किसी के हौसले बुलंद है। पिछले साल की ही बात करें तो जिले की एक महिला रोगी को एमबी अस्पताल के संविदारत चिकित्सक द्वारा निजी लैब पर भेजना और उसके उपचार पर भारी भरकम खर्च का मामला उजागर हुआ। राजस्थान पत्रिका पीडि़त परिवार की आवाज बना तो जिला परिषद की बैठक में मुद्दा उठाया गया, तब जाकर पीडि़ता का चिरंजीवी योजना में उपचार शुरू हुआ। इसी तरह पिछले साल पकड़े गए एक अवैध निजी चिकित्सालय में मरीजों के उपचार के नाम पर उनसे भारी भरकम उपचार शुल्क की वसूली चिकित्सा विभाग ने ही पकड़ी। ठीक वैसा ही मामला बुधवार को सामने आया। चिकित्सा विभाग के अधिकारी मरीजों को फंसाने में निजी एम्बुलेंस संचालकों का गिरोह सक्रिय होना तो स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन न तो ऐसे लोगों की पहचान कर पा रहा है और ना ही उन पर कोई कार्रवाई कर पा रहे हैं। विगत कुछ माह पहले निजी सोनोग्राफी सेंटर पर सरकारी इंजेक्शन की कालाबाजारी का प्रकरण भी चिकित्सा माफिया की गहरी जड़ों का बड़ा उदाहरण है। लेकिन विभाग इस कृत्य में लिप्त किसी भी व्यक्ति पर ठोस कार्रवाई नहीं कर पाया है। पुलिस जांच रेंग रही है और चिकित्सा विभाग मामले को उजागर कर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर चुका है। लब्बोलुआब यही है कि जिम्मेदार ऐसे लोगों पर नकेल कसने में नाकाम हैं, जो चिकित्सा माफिया से जुड़े हुए हैं। सरकार चाहे कितनी भी जनहित की योजनाएं संचालित कर ले, लेकिन जब तक इस तरह के गिरोह सक्रिय रहेंगे, योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के दावे खोखले ही साबित होंगे।