
वैसे तो विद्यालय प्रबंधन भवन को बदलने की अर्से से गुहार कर रहा है, लेकिन वे कागजी ही साबित हुए हैं। वर्ष 2016 से 2018 तक तत्कालीन प्रधानाध्यापिकाएं डीईओ को पत्र लिखती रही है कि भवन स्वामी अब किराया नहीं ले रहे। वे बढ़ी हुई दर से पैसा मांग रहे हैं, जिसे लेकर उन्होंने वाद दायर कर रखा है। साथ ही बैठक के लिए पर्याप्त कमरे उपलब्ध नहीं हैं। हैण्डीक्राफ्ट का कारखाना चला रखा है, जिसके शोरगुल से पढ़ाई में व्यवधान होता है। भवन स्वामी परिवार सहित उसी परिसर में रहते हैं। डीईओ के आदेश पर उमावि अम्बामाता औ
भुवनेश पंड्या/ उदयपुर . वाह री व्यवस्था! इसे देखकर तो मुंह से यही निकलेगा। शहर के बीचोंं-बीच एक सरकारी स्कूल ऐसा है, जो करीब 54 वर्ष से फर्नीचर के जर्जर कारखाने में चल रहा है। पहले यह मीडिल (1964) और बाद में माध्यमिक (1968) हो गया, लेकिन नहीं बदली तो उन बच्चों की तकदीर, जो लकड़ी चीरने के कर्कश शोर एवं पेंट की असहनीय गंध के बीच शिक्षा पाने की जद्दोजहद में जुटे हैं। यह हाल है राजकीय कस्तूरबा बालिका माध्यमिक विद्यालय का, जो शिवरती की हवेली में चल रहा है। स्कूल के साथ ही शुरू होता है फर्नीचर तराशने का काम। दिनभर तेज आवाज पूरे स्कूल में गूंजती है, तो फर्नीचर को रंगने वाले पेंट व वार्निश से उठती दमघोंटू दुर्गंध बच्चों को खूब परेशान करती है।
Published on:
27 Mar 2018 04:20 pm
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