
हल्दी घाटी युद्ध विशेष: मेवाड़ की आन बान शान के लिए हुए इस संग्राम की वो खास बातें जिन्हें पढ़कर आपके रोंगटे खड़ें हो जाएंगे- PART 2
चन्दन सिंह देवड़ा / उदयपुर- पहले भाग में आपने पढ़ा कि किस तरह प्रताप और उनकी सेना ने गुरिल्ला युद्ध नीति के द्वारा मुगल सेना को तितर-बितर होने पर मजबूर कर दिया। यहां से भागते हुए जब मुगल सेना खमनोर गांव पहुंची तो फिर क्या हुआ आगे… पढ़िए मेवाड़ की आन बान शान की रक्षा के खातिर महाराणा प्रताप और मुग़ल सेना के बीच हुए हल्दीघाटी का युद्ध। यह संग्राम शौर्य,साहस,स्वाभिमान और बलिदान का प्रतीक बनकर उभरा और आज भी हल्दीघाटी की माटी उस स्वाभिमान का गौरव याद दिलाती है। हल्दीघाटी युद्ध की गाथा पर पढ़िए पत्रिका की खास रिपोर्ट का भाग- 2
रक्त तलाई.....
इस युद्ध में प्रताप की सेना का नेतृत्व हकिमखान सूरी कर रहे थे तो अकबर की फौज मानसिंह की अगुवाई में लड़ रही थी। भगदड़ के बीच मुगल फौज खमनोर में रुकी तो महाराणा प्रताप की सेना भी उनका पीछा करते हुए वहां पहुंच गई। अचानक गुरिल्ला छापा मार युद्ध नीति खुले युद्ध में बदल गई। दोनों सेनाओ में भीषण युद्ध हुआ।
चारों तरफ तलवारों की टंकार, हाथियों की चिंगाड, घोड़ो की टापों और घायल सैनिकों की चीत्कार ही सुनाई देने लगी। प्रताप ने इसी दौरान चेतक को ऐंठ लगाई और मुगलों के सैनिकों को काटते हुए हाथी पर बैठे मानसिंह के सामने जा धमके। एक इशारे पर घोडे ने अपने दोनों पैर हाथी के माथे पर रख दिए तभी प्रताप ने भाले का भरपूर वार मानसिंह पर किया मान सिंह ओहदे में छिप गया और भाला महावत को जा लगा।
हाथी की सूंड में पकड़ी तलवार से चेतक का पिछला पैर कट गया। घायल चेतक को देख मुगलो ने प्रताप को घेर लिया। इसी बीच प्रताप के हमशक्ल झाला मान और दूसरे राजपूत सरदार प्रताप को युद्ध मैदान से सुरक्षित निकालने में लग गए। झाला मान ने राज मुकुट धारण कर लिया जिससे दुश्मन उन्हें प्रताप समझ उनपर टूट पड़े।
झाला मान अदम्य साहस से लड़ते हुए वीर गती को प्राप्त हुए। कहते है उनके हाथ में तलवार की मूठ इतनी कसकर पकड़ी हुई थी की उनसे अंतिम संस्कार के वक्त पर भी छुड़ाया नहीं जा सका। 18 हजार सैनिक यहां मारे गये जिससे यहां एक तलाई रक्त से भर गई जिसे आज रक्ततलाई के नाम से जाना जाता है। यहां वीरगति पाने वालों की छतरिया भी बनी हुई हैं।
इधर स्वामिभक्त चेतक घायल होते हुई भी मेवाड़ के प्रताप को युद्ध भूमि से सुरक्षित निकाल ले आया। उसने 3 टांग पर ही 22 फीट के बरसाती नाले को पार कर लिया और फिर प्रताप की गोद में प्राण त्याग दिए। आज चेतक की समाधी पर लोग शीश नवाते है। प्रताप ने इस युद्ध के बाद अटल प्रतिज्ञा कर ली और जंगलो में रहकर दुश्मनो से लोहा लेते रहे लेकिन अकबर की गुलामी स्वीकार नहीं की।
इतिहासकार इस युद्ध की हार जीत पर बंटे हुए है लेकिन जिस मकसद से मानसिंह को अकबर ने प्रताप को जिन्दा या मुर्दा लाने भेजा वो पूरा नहीं हो सका जिससे अकबर मानसिंह से खफा हो गया।
हल्दीघाटी संग्रहालय
महाराणा की युद्ध स्थली को राष्ट्रीय स्मारक गोषित किया गया है। यहां एक संग्रहालय भी बना है जो हल्दी घाटी के इतिहास को आने वाले पर्यटको को जीवंतता के साथ बताता है। यह युद्ध स्वतंत्रता संग्राम की झलक थी। प्रताप ने अधीनता स्वीकार नहीं कर मुगलों को चैन से नहीं रहने दिया। दिवेर, कुंभलगढ़ समेत कई किले और चौकियां जीत ली और 57 साल की उम्र में शौर्य, त्याग, बलिदान, समर्पण और देशप्रेम की प्रतिमूर्ति हिंदुआ सूरज चावंड में सदा के लिए अस्त हो गया।
Updated on:
18 Jun 2018 11:51 am
Published on:
18 Jun 2018 11:43 am
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