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हथकरघा से हारने लगे हाथ, पूरे दिन परिश्रम पर मेहनताना 40 रुपए

- टूटने लगा परम्परागत कला से नाता- पेट भरने तक भी काम नहीं आ रही ये कारिगरी केस 1 - धोरीखेड़ा गांव निवासी केरिंग सालवी ने बताया कि कई वर्ष पहले यह उद्योग गांवों में बेहतर चलता था, लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं। कई वर्ष पूर्व लोगों को तीन-तीन माह का प्रशिक्षण दिया गया, लेकिन सरकार अब भूल चुकी है। कोई योजना का लाभ नहीं मिला। हम लोग सब कुछ छोडक़र शहर आकर रहने लगे। हमारे साधन भी कबाड़ हो चुके हैं। पहले हम धोती, रूमाल, नेजे आदि बनाते थे। केस 2 - सलूम्बर क्षेत्र के मैथूड़ी निवासी देवीलाल का कहना है कि कई वर्षों तक उन्होंने हथकरघा का काम किया। सिर पर बांधने का फेंटा, रजाई की खोली सहित कई कपड़े बनाते थे लेकिन अब तो इससे कमाई नहीं होती है, इसलिए इसे बंद करना पड़ा। समाज अब इस काम से दूर होता जा रहा है। सरकार ने ध्यान नहीं दिया, इसलिए हमारी पीढ़ी इससे दूर हो गई। केस 3 - कुराबड़ क्षेत्र के रणिजा गांव निवासी कालूलाल ने बताया कि पहले हमारा पूरा परिवार यह काम करता था, लेकिन अब सब कुछ खत्म हो गया। पहले तो कपड़े बनाते थे, लेकिन अब तो केवल रूई से धागा बनाने का काम ही रह गया। इसमें भी इतनी कम आमदनी होती है कि लोग अब पूरी तरह काम बंद कर देंगे। एक तो बाजार की मार और ऊपर से सरकार का ध्यान नहीं दे रही है। केस 4 -उथरदा निवासी गौतमलाल का कहना है कि सरकार एक पैसा नहीं दे रही है। परम्परागत काम इसलिए बंद होने लगा क्योंकि जितनी मेहनत होती है उतनी राशि नहीं मिलती है। साथ ही अब हथकरघा से कपड़ा तैयार करने के लिए सामग्री भी महंगी है। हमारे साधन व उपकरण भी कबाड़ होने लगे हैं। केस 5- धोरीखेड़ा निवासी शिवराम का कहना है कि पहले हमारे समाज का केवल यही काम करता था, लेकिन अब धंधा बंद हो गया क्योंकि इससे घर तक नहीं चलता था। ऐसे में काम बंद करना पड़ा। अब तो हमारे उपकरण ही बेकार होने लगे हैं।

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हथकरघा

हथकरघा

भुवनेश पण्ड्या

उदयपुर. सलूम्बर क्षेत्र के जावद गांव की कंकू बाई, भंवरी, सवी बाई, लक्ष्मी, भवानी, धूलीबाई और मांगीदेवी दिन भर घर में रूई कातने का काम करती है और उन्हें मिलते हैं तो दिन के 35 से 40 रुपए। वे न तो किसी योजना के बारे में जानती है और ना ही उन्हें यह पता है कि सरकार इस काम में सहयोग भी करती है। उन्हें यह काम सलूम्बर क्षेत्र में चल रहे खादी भंडार से प्रति सप्ताह मिल रहा है। वहां से रूई कात कर इसे धागा बनाने के लिए कार्मिक घर पर रूई रख जाते हैं। बाद में वह आकर धागे ले जाते हैं। इस काम के लिए उन्हें एक दिन के अधिकतम 40 रुपए मिलते हैं।

हथकरघा:

हथकरघा उद्योग में हाड़तोड़ मेहनत के बावजूद कम आमदनी ने इस विधा के बुरे दिन ला दिए हैं। जिले में कम कमाई से बुनकर समाज के कारीगरों के हाथ थकने लगे। अब चंद गांवों में ही हथकरघा संचालित है, लेकिन वह अंतिम सांसें ले रहा है। गिने-चुने परिवारों की महिलाएं ही इससे अपना खर्च चला रही हैं, लेकिन यही हाल रहा तो यह परम्परागत विधा समाप्त हो जाएगी। सरकार ने भले ही कई कागजी योजनाएं चला रखी हैं, लेकिन ये धरातल पर उतरने से पहले ही दम तोड़ चुकी हैं।

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ये हैं योजनाएं
अन्‍य राज्‍य के हथकरघा उत्‍पाद एवं योजनाओं की जानकारी के लिए राज्‍य सरकार के खर्च पर बुनकरों को अध्ययन यात्रा पर भेजा जाता है। हथकरघा क्षेत्र के संवर्धन के लिए निम्‍न योजनाएं राज्‍य सरकार की ओर से संचालित की जा रही हैं :-

1. डिजाइन विकास योजना

2. तकनीकी उन्‍नयन योजना
3. मेलों-प्रदर्शनियों में भागीदारी

4. प्रचार-प्रसार
5. वंचित बुनकरों से वस्‍त्रों की खरीदारी

6. हाथकरघा वस्‍त्रों की बिक्री

रोजगार देने की योजनाएं नहीं
इन योजनाओं के क्रियान्‍वयन से लाभान्वितों को सीधा रोजगार देने की कोई विशिष्‍ट योजना नहीं है, लेकिन सरकार हस्‍तशिल्‍प एवं हथकरघा क्षेत्र के दस्‍तकारों, बुनकरों को अपना-अपना स्‍वरोजगार स्‍थापित कर आर्थिक रूप से उन्नत करने की बात कहती रही है। सरकार जिन बुनकरों को लाभान्वित करने का राग अलाप रही है, उनमें चार वर्ष में साढ़े तीन हजार बुनकरों को लाभ दे पाई है।

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वर्ष लाभान्वित बुनकर

2014-15 773
2015-16 1276

2016-17 9182
017-18 592

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सालवी बुनकर समाज पूर्व में रूई से धागा और उससे खुद की कला से कपड़ा तैयार करते थे और कपड़ा बाजार में पहुंचाते थे लेकिन अब यह विधि पेट नहीं पाल पा रही है। पैसा नहीं मिलने के कारण लोग इससे दूर हो रहे हैं। नई पीढ़ी तो अब यह पूरी इसे त्याग चुकी है। सरकार इस विधा को बचाने के लिए आगे आए।
गणेशलाल गायकवाल, संरक्षक, अखिल भारतीय सालवी बुनकर महासभा