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Rajasthan News: हाथों से बने बर्तनों की कारीगरी पड़ी फीकी, अब बढ़ रहा स्टील का ट्रेंड

Rajasthan News: उदयपुर शहर में कसारों की ओल कभी अलसुबह से देर रात तक ठक-ठक-ठक की आवाज से गूंजती थी। यह आवाज यहां बनने वाले पीतल और तांबे के बर्तनों की हुआ करती थी।

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Rajasthan News: उदयपुर शहर में कसारों की ओल कभी अलसुबह से देर रात तक ठक-ठक-ठक की आवाज से गूंजती थी। यह आवाज यहां बनने वाले पीतल और तांबे के बर्तनों की हुआ करती थी। इस पर डिजाइन बनाने के लिए कारिगर हथोड़ों से पीटते हैं। अब यह सीमट कर कुछ घरों तक ही रह गई है। ऐसा पीतल के बर्तनों का चलन घटने और अन्य कारणों से हुआ है।

आज से बीस साल पहले कसारा समाज के 40 से अधिक परिवारों की आजीविका पीतल और तांबे के बर्तन बनाने से ही चलती थी। वक्त बदला और बाजार में मशीनों से बनने वाले बर्तनों का चलन बढ़ गया। इधर मेहनताना कम होने से समाज के लोग अन्य कार्य करने लगे। ऐसे में आज मात्र 8 कारिगर ही बर्तन बनाने का काम कर रहे हैं। ऐसे में यह कला धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर पहुंच गई है।

मनोहर लाल कसारा ने बताया कि पीतल और तांबे के बर्तन बनाने में मेहनत खूब लगती है। पहले बर्तन के अलग-अलग हिस्से बनाकर उनकों चमकाना और हाथों से डिजाइन देने में खूब समय लगता है। पीतल महंगा होने के कारण इसका भाव 750 से 800 रुपए किलो तक होता है। चरू ही तीन किलों के आसपास बनता है। ऐसे में 2400 से 2500 रुपए कीमत होती है। जबकि मशीन से बने अन्य धातु के बर्तन 500 से 700 रुपए में मिल जाते हैं। 20 साल पहले 500 से 600 बर्तन प्रतिदिन बनते थे। अब 50 से 60 बर्तन ही बनते हैं।

अमृत लाल कसारा ने बताया कि 20 साल पहले तक हमारे समाज के 40 परिवार पीतल और तांबे के बर्तन बनाकर आजीविका चला रहे थे। तब इन बर्तनों की मांग काफी अधिक थी। अब कारिगर कम हो गए हैं मेहनत भी उतनी ही लगती है, लेकिन मेहनताना नहीं उतना नहीं मिलता। ऐसे में लोग यह काम छोड़कर अन्य कार्य करने लगे हैं। आज कोयला 70 रुपए किलो हैं वहीं अन्य सामान की लागत भी बढ़ गई है।

यह सामान बनते हैं पीतल और तांबे के
पीतल और तांबे के चरू, चरवी, परात, थाली, गिलास, कटोरी, तपेली, रोटी का डिब्बा आदि बर्तन बनाए जाते हैं। इसके साथ ही तांबे के चरू, शिवजी का नाग, मंदिरों के कलश आदि भी कसारा समाज के कलाकार ही तैयार करते हैं।

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परंपरा ने जीवित रखी है कला
मेवाड़ में दहेज में पीतल और तांबे के पांच बर्तन देने की परंपरा का आज भी निर्वहन किया जा रहा है। विशेष रूप से गांवों में इस परंपरा को निभाया ही जाता है। हालांकी इन बर्तनों की मांग घटी है, लेकिन गांवों में अभी भी मांग बनी हुई है।

धनतेरस पर रहती थी खूब मांग
धनतेरस पर बर्तन खरीदने की परंपरा के तहत भी कुछ वर्ष पहले तक लोग पीतल और तांबे के बर्तन खरीदते थे। अब लोग अन्य धातुओं के बर्तन खरीदना अधिक पसंद करते हैं। ऐसे में हाथ से बने इन बर्तनों की पूछ घटी है।

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