
उदयपुर. अंग्रेजों के शासन काल में भारत के राजाओं को तोपों की सलामी मिलती थी। उसमें राजस्थान में उदयपुर भी विशेष रूप से स्थान था। वर्ष 1858 की में रानी विक्टोरिया ने एलान किया था कि भारतीय रियासतों के शासकों को व्यक्तिगत और राजनीतिक तौर पर तोप की सलामियां दी जाएंगी। राजपुताना में 19 राज्यों के शासकों को तोपों की सलामी लेने का अधिकार था। राजाओं को उनकी हैसियत के अनुसार तोपों की सलामी की संख्या निश्चित की गई थी जिनकी संख्या 9 से 21 तक थी। तोपें उस समय दागी जाती थीं जब कोई राजा-महाराजा वायसराय से भेंट करने आता था। रियासतों में शासक या युवराज के जन्मदिन अथवा रियासती दरबार के अवसर पर तोपों की सलामी का प्रचलन था। करीब 200 भारतीय शासक ऐसे थे, जिन्हें तोपों की सलामी प्राप्त करने का अधिकार नहीं था।
उदयपुर के तत्कालीन महाराणा अपनी रियासत में ले सकते थे 21 तोपों की सलामी
राजपुताना की रियासतों में 19 तोपों की सलामी केवल उदयपुर के तत्कालीन महाराणा को दी जाती थी। ये सलामी रियासत से बाहर मिलती थी, जबकि वे अपनी रियासत में 21 तोपों की सलामी ले सकते थे। 17 तोपों की सलामी पाने वाले शासकों में बीकानेर के तत्कालीन महाराजा, भरतपुर के महाराजा, बूंदी के महाराजा, जयपुर के महाराजा, जोधपुर के महाराजा, करौली के महाराजा, कोटा के महाराव तथा टोंक के नवाब सम्मिलित थे। अलवर के महाराजा, बांसवाड़ा के महारावल, धौलपुर के महाराज-राणा, डूंगरपुर के महारावल, जैसलमेर के महारावल, किशनगढ़ के महाराजा, प्रतापगढ़ के महारावल तथा सिरोही के महारावल को 15 तोपों की सलामी दी जाती थी। झालावाड़ के महाराज-राणा को 13 तोपों की सलामी मिलती थी। वहीं, 21 तोपों की सलामी वाली रियासतें थीं बड़ौदा, ग्वालियर, हैदराबाद, जम्मू और कश्मीर, मैसूर। अंग्रेज सरकार द्वारा विभिन्न राज्यों के राजाओं के लिए तोपों की सलामी की संख्या अंग्रेज सरकार के साथ उस राज्य के सम्बन्धों की स्थिति पर निर्भर करती थी। इस कारण यह घटती बढ़ती भी रहती थी।
Published on:
02 Jul 2020 02:32 pm
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