
मधुसूदन शर्मा
उदयपुर। उदयपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित है राजसमंद जिले का खमनौर गांव। यहां के इत्र की खुशबू से पूरा भारत महकता है। खमनौर के शाहीबाग न केवल गुलाब का इत्र बनाने में मशहूर हैं बल्कि ये औषधीय और पेय पदार्थ बनाने के लिए भी खास पहचान रखते हैं। आज हम आपको ऐसे शख्स से मिलवाने जा रहे हैं, जिनकी चार पीढियां इस काम को कर रही है। इनका नाम है मोतीलाल माली। इनके दादा, परदादा की मेहनत का बगीचा आज फल फूल रहा है।
मोतीलाल ने बताया कि उनका परिवार 1964 से इत्र बनाने का काम करता आया है। यह इत्र भारत के कौने-कौने में जाता है। अहमदाबाद, कोलकाता, दिल्ली, चैन्नई, गुजरात, वड़ोदरा, गुडग़ांव सहित झारखण्ड, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, जम्मू-कश्मीर सहित देश के अनेक राज्यों में इसकी खास मांग है। यही नहीं विदेशों में भी खमनौर के इत्र की मांग रहती है। गुलाब के अलावा दूसरी वैरायटी चंदन और मोगरा के इत्र की भी काफी मांग है।
घर पर ही तैयार होता है इत्र
यहां के कारीगरों ने घरों में ही इत्र बनाने के संसाधन जुटा रखे हैं। साथ ही वे गुलाब की खेती भी करते हैं। अपने खेतों में उगने वाले गुलाब से ही इत्र का निर्माण किया जा रहा है।
चौथी पीढ़ी बढ़ा रही परम्परागत काम को आगे
मोतीलाल ने बताया कि वर्तमान में इस काम को आगे बढ़ाने में उनके परिवार की चौथी पीढी लगी हुई है। जिसमें उनकी दो बहुएं और तीन पोतियां भी शामिल हैं। ये इत्र के अलावा गुलकंद, शर्बत, अजवाइन अर्क, गुलाबजल, गुलाब गुलकंद आदि बनाने में सहयोग करती है। हालांकि अब गांव के कई परिवार यह कार्य करने लगे हैं।
एक माह में तैयार होता है एक किलो इत्र
हम जिस गुलाब इत्र की बात कर रहे हैं। इसे भट्टी के माध्यम से तैयार किया जाता है। इसे बनाने में करीब एक माह का समय लगता है। माली ने अपने खेत में करीब दस से बारह हजार पौधे लगा रखे हैं। एक पौधे में करीब दो साल में फूल आना शुरू हो जाते हैं। गुलाब के फूल से निकलने वाला रस इत्र का रूप लेता है।
Published on:
12 Oct 2023 11:00 am
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