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सदियों से कलाधर्मी और कला चेतन प्रदेश रहा है राजस्थान

साक्षात्कार: चित्रकाल और कला समीक्षक ए.एल. दमामी से बातचीत

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सदियों से कलाधर्मी और कला चेतन प्रदेश रहा है राजस्थान

सदियों से कलाधर्मी और कला चेतन प्रदेश रहा है राजस्थान

राजस्थान सदियों से कलाधर्मी और कला चेतन प्रदेश रहा है। यहां गौरवशाली कलाओं का खजाना है, लेकिन अनेक अल्पकालिक परिवर्तनों के बाद औपनिवेशिक और पश्चिमी प्रभाव से मुक्त जब देश में आधुनिक कला बोध का प्रवर्तन हुआ। प्रदेश में कला गतिविधियों का तेजी से संचार हुआ। आरंभिक आधुनिक बोध, पहुंच, रचना क्रिया में अवधारणा और समझ का अभाव रहा है। यह बात कला समीक्षक ए.एल. दमामी ने कही। पेश है बातचीत के कुछ अंश।

कला की परंपरागत पद्धति और सैद्धांतिक रूप में क्या अंतर है?

- आधुनिकता भी परंपरा से ही नवबोध ग्रहण करती है। परम्परा भी अपने काल खंड में नई ही लगती है, लेकिन समय मूल्य वैचारिकता और परिस्थितिवश परिवर्तन होता है। लीक से हटना, नवसिद्धांत दृष्टिकोण के कारण विषय का संरचनात्मक रूपांकन, तकनीकी शैली आदि परंपरा से अलग हो जाती है। आधुनिकता समय से नहीं, बल्कि नजरिये से प्रभावित होती है।

आप कला समीक्षक हैं, कला इतिहास और समीक्षा में क्या अंतर है?

- इतिहासकार कलाकृति का कालखंड, स्थिति, माध्यम और तत्कालीन शैली का उल्लेख करता है, लेकिन समीक्षक कृति की रचनात्मकता, संरचनात्मक संबंधी तमाम अनिवार्य तत्वों और कलाकार के मंतव्य की व्याख्या करता है।

राजस्थान में कला समीक्षा की क्या स्थिति है?

- राजस्थान में समीक्षक नहीं, वरन रसिक की परंपरा रही है। हिंदी में वर्णित समीक्षा कला भाषा, शब्दावली, संरचनात्मक तत्व और शैलीगत मूल्यांकन के बजाय दर्शन, धर्म पुराण की कृति में खोज की जाती है। महाकवि और चित्रकार टैगोर ने चित्रकला को मौन कला कहा है। चित्रकार कथा चित्रित करता है, लेकिन वह कथावाचक नहीं होता।

आधुनिक कला प्रयोगों के बारे में क्या कहेंगे?

- आधुनिक कला की अवधारणा के संबंध में विवाद और भ्रांतियां भी है। पश्चिमी दार्शनिक अवधारणा से भारतीय पेगेनिज्म की अवधारणा अलग नहीं है। अपितु धु्रवीय दृष्टिबोध का भेद है। हम पूर्ववत बहुलतावादी हैं। वर्तमान में हमारा एक पैर पश्चिमी चिंतन और दूसरा हमारी परंपरा में है।

वर्तमान में कला शिक्षा की उपयुक्तता पर क्या कहेंगे?

- कला शिक्षा स्कूल से लेकर कॉलेज तक एक प्रचलित धारा परिपाटी से झकड़ी हुई है। सृजनात्मक शिक्षण और अध्ययन-अध्यापन के क्रियान्वयन की जरुरत है। वर्तमान में कला खास वर्ग की होकर रह गई है। आमजन की उपस्थिति नहीं रही। इस पर पुनर्विचार होना चाहिए।

युवा चित्रकार प्रतिभा कैसे दिखा सकते हैं?

- थिंक ग्लोबली एंड एक्ट लोकली...। बहुसूचित रहना, पठन-मनन-चिंतन और अपनी विरासत के स्रोत का शोधपूर्ण रचना कर्म पहचान बनाता है।

विशेषज्ञ परिचय

एएल दमामी कला क्षेत्र में बीते 25 साल से सक्रिय है। अंग्रेजी, दर्शनशास्त्र में एमए करने के बाद पूणे विवि से एमएड की। चित्रकार रहते हुए वे कला समीक्षक रहे। देशभर में कला प्रदर्शनियां आयोजित की। 1983 में राजस्थान ललित कला अकादमी ने कला पुरस्कार से नवाजा। अकादमी कार्यकारिणी और पब्लिकेशन समिति के सदस्य रहे। अकादमी की पत्रिका 'आकृतिÓ के संपादक भी रहे। कला पर अनेक पुस्तकें लिख चुके हैं।


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