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बीकानेर से 400 साल पहले उदयपुर पधारीं थी मां करणी, सफेद चूहों का निवास यहां भी

Karni Mata Temple करणी माता दरअसल राजस्थान की लोकदेवी हैं। कहा जाता है कि इनकी पूजा से मन की इच्छाएं पूर्ण होती हैं। इसलिए इन्हें मंशापूर्ण करणी माता कहा गया है।

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बीकानेर के देशनोक में करणीमाता मंदिर की तरह ही उदयपुर की मंशापूर्ण करणी माता को भी जाना जाता है। दरअसल, यहां करणी माता बीकानेर से ही पहुंची थी। करणी माता दरअसल राजस्थान की लोकदेवी हैं। कहा जाता है कि इनकी पूजा से मन की इच्छाएं पूर्ण होती हैं। इसलिए इन्हें मंशापूर्ण करणी माता कहा गया है। मंदिर के पुजारी प्रदीप कुमावत ने बताया कि इस मंदिर का ऐतिहासिक महत्व भी उतना ही है जितना बीकानेर व जोधपुर का है। मेवाड़ के तत्कालीन महाराणा कर्ण सिंह का विवाह बीकानेर राजघराने में हुआ तब मां करणी माता मेवाड़ पधारी थीं। तत्कालीन समय 1621-1628 में तत्कालीन महाराणा कर्णसिंह के शासन में मराठों के आक्रमण का भय बना रहता था, ऐसे में तत्कालीन महाराणा के मंत्री अमरचंद बड़वा ने एकलिंगगढ़ दु्र्ग का निर्माण करवा कर शहरकोट बनवाया। उस समय माता करणी के मंदिर की इस विश्वास के साथ स्थापना की गई कि बीकानेर व जोधपुर की तरह ही मेवाड़ भी सुरक्षित रहेगा। दयामयी मां करणी ने मरूधर की तरह मेवाड़ पर भी कृपा रखी व मेवाड़ क्षेत्र को आक्रमणकारियों से निर्भय रखा व मेवाड़ का गौरव बनाए रखा।

यहां भी सफेद चूहे देखने को मिलते

करणी माता को चूहों की देवी के रूप में भी जाना जाता है। जिस तरह से बीकानेर के मंदिर में बड़ी संख्या में सफेद चूहे पाले गए हैं। इन सफेद चूहों को काबा कहा जाता है, जिनके दर्शन करना शुभ माने जाते हैं। उसी तरह यहां भी सफेद चूहे देखने को मिलते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु उन चूहों का दर्शन करते हैं। मंदिर परिसर में एक शिव मंदिर का भी निर्माण कराया गया है। मंदिर पुजारी कुमावत ने बताया कि दशहरे के मौके पर मां करणी का ब्रह्म मुहूर्त में सुबह शृंगार कराया जाता है। इस दिन दर्शन करना अत्यंत शुभ माना जाता है और जो भी माता के दर्शन करने आता है माता उसकी मंशा पूर्ण करती है।