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उदयपुर. क्या आपने कभी गौर किया है कि आजकल तितलियां कहीं नजर नहीं आती, यहां तक कि बाग-बगीचों में भी अब बमुश्किल ही दिखती हैं। जबकि एक समय था जब रंग-बिरंगी तितलियां एक फूल से दूसरे फूल पर मंडराती हर घर में दिखा करती थी, उन तितलियों के पीछे दौड़ते हुए और उन्हें पकडऩे की कोशिश करते बच्चे भी दिखते थे, लेकिन अब ये नजारे कहीं नहीं दिखते। इसका कारण तितलियों की संख्या कम होना है।
संरक्षण की जरूरत
वन्य जीव विशेषज्ञ डॉ. सतीश शर्मा के अनुसार तितलियों और मधुमक्खियों की संख्या सभी जगह से कम हो गई हैं। इनके संरक्षण की जरूरत है। ये वन्य जीव संरक्षण अधिनियम में संरक्षित कीट हैं। तितली और मधुमक्खी ऐसे कीट हैं जिनकी मनुष्य जाति को जिंदा रखने में महत्वपूर्ण भूमिका है। ये फूलों और लाखों अन्य किस्मों के पौधों का परागण करते हैं और इस चक्र के कारण ही मनुष्य को भोजन मिलता है।
इन कीटों के संरक्षण के लिए वे सब विधियां अपनानी चाहिए जिनसे तितलियों, मधुमक्खियों और अन्य उपयोगी कीड़ों का संरक्षण हो। अगर इनका संरक्षण नहीं हुआ तो ये मनुष्य जाति के अस्तित्व पर भी संकट है। तितलियों के कम होने की वजह उनके आवास खत्म होना है। शहरों में तो अतिक्रमण है ही बल्कि अब जंगलों में भी अतिक्रमण होने से तितलियों पर संकट आ गया है। दूसरा खतरा खेतों में कीटनाशकों के उपयोग से है। किसान जितना कीटनाशकों का उपयोग करेंगे, वे खेतों से उतना ही दूर रहेंगी। जबकि तितलियां किसान मित्र हैं। ये नुकसान नहीं पहुंचाती हैं, ये समझना होगा। वहीं तितलियों के संरक्षण के लिए जरूरी है कि आसपास के परिवेश में तरह-तरह के फूलों के पौधों लगाएं और उनका संरक्षण करें।
15 साल से तितलियों का पीछा
सागवाड़ा के बटरफ्लाई एक्सपर्ट मुकेश पंवार पिछले 15 सालों से तितलियों पर शोध कर रहे हैं। वे पेशे से सरकारी शिक्षक हैं, लेकिन तितलियों के प्रति आकर्षण ने उन्हें इस ओर खींचा। पंवार ने बताया कि 14 मार्च का दिन यूरोप व अमरीका में ‘बटरफ्लाई डे’ मनाया जाता है। इस दिन को लर्न अबाउट बटरफ्लाई डे के रूप में भी जाना जाता है। कई बटरफ्लाइज शीत रक्त प्राणी होने से ग्रीष्म आगमन के इस ऋतु संधि काल से सुप्तावस्था से बाहर आकर सक्रिय होने लगती हैं। इन दिनों सहजन, शीशम, पलाश, सेमल आदि पर फूल खिले हुए हैं, ऐसे में इन फूलों पर कॉमन रोज, प्लेन टाइगर, जेब्रा ब्लू आदि तितलियों को देखा जा सकता है। लेकिन अब पहले के मुकाबले ये तितलियां कम हुई हैं। इसका कारण ये है कि देसी वनस्पति कम हो गई हैं जिनमें कीकर, हर के पेड़ भी शामिल हैं। पंवार ने बताया कि तितलियां प्राकृतिक पर्यावरण के उत्तम स्वास्थ्य का प्रतीक हैं। ये परागण करती हैं जिससे पौधों को फूल से बीज बनाकर वंशवृद्धि में सहयोग मिलता है।
मेवाड़ में से तितलियां
कॉमन ग्रास यलो, कॉमन इमीग्रंट, मोटल्ड इमीग्रंट, कॉमन टाइगर, ग्रे पेंसी, यलो पेंसी, कॉमन इवनिंग ब्राउन, कॉमन सिल्वरलाइन, इंडियन सनबीम, इंडियन रेडफ्लेश, स्ट्रिप्ड पीएरोट, अनोमलोस नवाब, ब्लेक राजा, व्हाइट अरब, स्मॉल सालमोन अरब आदि।
इस तरह से हो तितलियों का संरक्षण
- फूलों के पौधों का संरक्षण हो, सडक़ों के किनारे लगाएं।
- खेतों में कीटनाशकों का कम उपयोग हो।
- जंगलों में जो आग लगाई जाती है, उस पर भी नियंत्रण करना होगा। आग लगाने से तितलियों के अंडे और लार्वा मर जाते हैं, इससे संख्या घट रही है।
- जंगलों में अतिक्रमण को बंद किया जाए ताकि तितलियों के आवास सुरक्षित रहें।
- खुले पानी के स्रोत ज्यादा से ज्यादा होने चाहिए, ताकि उनका जीवन चक्र सही रूप से चल सके।
- जो नर तितलियां हैं वे कीचड़ में मड पुडलिंग करती हैं यानी मिट्टी में घुले हुए लवणों को पीते हैं जिससे उनकी ब्रीडिंग साइकिल सही चलती है। जंगल में कई नम क्षेत्र होते हैं जहां पानी के रिसकर आने से कीचड़ होता है। ऐसी जगहें उन्हें मिलनी चाहिए।
Published on:
14 Mar 2020 12:40 pm
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