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हल्दीघाटी युद्ध की शुरुआत से अंत तक था मुगल सेना में भय का माहौल

हल्दीघाटी युद्ध तिथि विशेष : इतिहास के पन्नों में छिपी है अकबर की सेना की मन:स्थिति

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हल्दीघाटी युद्ध की शुरुआत से अंत तक था मुगल सेना में भय का माहौल

हल्दीघाटी युद्ध की शुरुआत से अंत तक था मुगल सेना में भय का माहौल

जितेन्द्र पालीवाल @ उदयपुर. दुनिया के महानतम युद्धों में शामिल हल्दीघाटी की जंग में मुगल सेना शुरुआत से लेकर आखिर तक भय के साए में रही। हर वक्त उन्हें डर सताता रहा था कि प्रताप की सेना से वे जीत पाएंगे या नहीं?
युद्ध को अपनी आंखों से देखने वाले इतिहासकार, सैनिक, लेखक और अकबर को जाकर प्रत्यक्ष वर्णन करने वाले बंदायूनी स्वयं लिखते हैं...
प्रथम दृश्य- प्रताप के हरावल सेना का नेतृत्व करने वाले मुस्लिम सेनापति हकीम खां सूरी ने इतनी भीषण शुरुआत की थी कि मुगल सेना को सात किलोमीटर पीछे तक मुगल कैम्प (वर्तमान में टेरोकोटा के लिए प्रसिद्ध मोलेला गांव) तक धकेल दिया गया। उस वक्त महत्तर खां ने यह अफवाह फैलाई थी कि मुगल सम्राट अकबर स्वयं आरक्षित सेना लेकर युद्ध भूमि में आ गए हैं, तब जब जाकर भागती हुई मुगल सेना का थोड़ा हौसला लौटा और उनके कदम रुक गए।
द्वितीय दृश्य- प्रताप ने अपने घोड़े चेतक पर सवार होकर विश्व की व्यापक सेना का नेतृत्व करने वाले मुगल सेनापति मानसिंह के हाथी की सूंड पर अपने दोनों पांव रखकर हमला किया तो ऐसी भीड़ में प्रताप ने मानसिंह पर भाले से वार किया, मगर मानसिंह महावत के ओहदे में छिप गया। प्रताप महावत के साथ मानसिंह को भी मरा हुआ समझकर अपने घायल चेतक की फिक्र में युद्ध भूमि से चले गए।
तृतीय दृश्य- हल्दीघाटी युद्ध के बाद मानसिंह गोगुंदा के महलों में चला गया तथा प्रताप की सेना के डर से चारों और गहरी खाई खुदवा दी गई। यह बड़ा प्रमाण है कि मुगल सेना का लीडर प्रताप और उनके साथी रणबांकुरों से युद्ध के काफी वक्त बाद भी भय के साए में जीता रहा।
अंतिम दृश्य- मानसिंह जब वापस अकबर के पास अपनी जीत का बखान करते हुए रामप्रसाद हाथी (मीरप्रसाद) को साथ लेकर जाने लगा तो रास्ते में लोगों ने विश्वास नहीं किया तथा तिरस्कार की दृष्टि व हारे हुए सेनापति के रुप में देखने लगे।
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प्रताप ने अपनी कीर्ति में कभी कुछ नहीं लिखवाया
इतनी बड़ी सेना के नेतृत्वकर्ता मानसिंह का हाथी पर बैठकर युद्ध करना, सामना न करना, अपने प्राण बचाने के लिए महावत के पीछे दुबकना, हल्दीघाटी युद्ध की निर्णयता बताता है। प्रताप ने अपने स्वयं की प्रशस्ति के लिए कभी कुछ नहीं लिखवाया, जबकि अकबर ने अपनी प्रशस्ति में अलोपनिषद, अकबरनामा जैसे ग्रंथ लिखवाए।
जी.एल. मेनारिया एवं डॉ. अजात शत्रु सिंह शिवरती एवं इतिहासकार