
traffic Jam
बे-रोकटोक कटते पहाड़, सड़कों पर रेंगते वाहन और झीलों में गिरता सीवरेज का दूषित पानी ... ये शहर की वो बड़ी समस्याएं हैं, जो मास्टर प्लान की अनदेखी से उपजी है। उदयुपर शहर के अब तक तीन मास्टर प्लान बन चुके, लेकिन जिम्मेदार सरकारी एजेंसियां इनके प्रावधानों पर अमल करने में नाकाम रहीं। नतीजा यह हुआ कि दुनिया के सबसे खूबसूरत शहरों में शुमार लेकसिटी में ये समस्याएं अब नासूर बनती जा रही है।शहर का पहला मास्टर प्लान १९७६ से १९९६ के लिए बना था। इसके बाद दूसरा मास्टर प्लान २००१ में बना। जिसे २००३ से २०२२ के लिए लागू किया गया। लेकिन इसी बीच २०११ की जनगणना के आंकड़े जारी हो गए। जिसके चलते शहर की ताजा जनगणना के अनुसार मास्टर प्लान का नया ड्राफ्ट तैयार किया गया। जिसमें आस-पास के १३६ गांवों को शामिल किया गया। जिसे २०१३ से २०३१ के लिए लागू किया। लेकिन इन सभी मास्टर प्लान को लागू करने में सबसे बड़ी खामी यह रही कि जिम्मेदार एजेंसियों ने इन्हें गंभीता से नहीं लिया। जिसका परिणाम आज पूरा शहर और यहां आने वाले पर्यटक भुगत रहे हैं। हालांकि मौजूदा मास्टर प्लान के क्रियान्वयन में अभी सात साल शेष हैं।
ये हो रहा है हश्र ...
उदयपुर में मास्टर प्लान का क्या हश्र हो रहा है? इसका अंदाजा बे-रोकटोक कट रही पहाडिय़ों को देखकर लगाया जा सकता है। जोकि ग्रीन बेल्ट का हिस्सा मानी जाती है। नए ग्रीन जॉन विकसित होना तो दूर, जो हैं वे भी सिमटते जा रहे हैं। गुलाब बाग जैसे रियासतकालीन उद्यान में सीमेंट कंक्रीट के निर्माण किए जा रहे है। इसके अलावा आबादी बढऩे व पर्यटकों की आवाजाही से सड़कों का दम घुट रहा है। रोजाना प्रमुख चौराहों पर ट्रेफिक जाम की स्थिति बन रही है। यूडीए की ओर से सुनियोजित आवासीय योजनाएं विकसित नहीं होने से भू-माफिया मास्टर प्लान को मटियामेट करते हुए अवैध कॉलोनियां बना रहे हैं। जिनमें न तो व्यवस्थित रोड नेटवर्क है और न ही पार्कों सहित अन्य सुविधाएं।
टूरिस्ट सिटी होने से उदयपुर में मास्टर प्लान लागू होना जरूरी
जानकारों के अनुसार उदयपुर प्रदेश के प्रमुख पर्यटक शहरों में से एक है। यहां हर साल लाखों की तादाद में पर्यटक आते हैं। जिनके लिए आधारभूत सुविधाओं की दरकार है। दूसरी ओर पर्यटकों की आवाजाही से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों जैसे सफाई, सीवरेज, क्राउड मैनेजमेंट आदि से निपटने की दरकार है। मास्टर प्लान पर सुनियोजित तरीके से अमल होने से शहर के आर्थिक विकास को भी गति मिल सकती है।
पहला मास्टर प्लान : १९७६-१९९६
दूसरा मास्टर प्लान : २००३-२०२२
तीसरा मास्टर प्लान : २०१३-२०३१
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क्रियान्वयन में चुनौतियां
- अनाधिकृत निर्माण
- एजेंसियों में तालमेल का अभाव- बजट की समस्या
- निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की कमी
मास्टर प्लान में ये महत्वपूर्ण
- रोड नेटवर्क- पार्किंग प्लेसेज
- पार्क निर्माण, रखरखाव- सफाई, सीवरेज-ड्रेनेज सिस्टम
- फ्लाई ओवर, एलिवेटेड रोड- इंडस्ट्रीज
ये है जिम्मेदार एजेंसियां
- यूडीए (पूर्व में यूआइटी)- नगर निगम
- पीडब्ल्यूडी- रीको
- पर्यटन
मास्टर प्लान के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी स्थानीय निकायों की होती है। वहां बैठे जिम्मेदार लोगों पर निर्भर करता है कि वे मास्टर प्लान को कितना गंभीरता से लेते हैं और उस पर कितना अमल करवा पाते हैं। यदि मास्टर प्लान को गंभीरता से लिया जाए तो शहरीकरण के दौरान आने वाली समस्याओं से निजात मिल सकती है। शहर में सुव्यवस्थित आवागमन के लिए रोड नेटवर्क डवलपमेंट, ग्रीन बैल्ट के लिए पुराने उद्यानों का रखरखाव व नए पार्कों का विकास, नई कॉलोनियों का विकास, व्यवस्थित सीवरेज व ड्रेनेज सिस्टम, अलग से ट्रेफिक प्लान आदि की मास्टर प्लान के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन उदयपुर सहित ज्यादातर शहरों में मास्टर प्लान पर गंभीरता से अमल नहीं हो पाता।
- एस.के.श्रीमाली, पूर्व मुख्य नगर नियोजक, राजस्थान सरकार
Published on:
08 Mar 2024 09:54 pm
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