
कला का कॉलेज है या ये है कबाड़ कॉलेज!
जितेन्द्र पालीवाल @ उदयपुर. कहने को तो मोहनलाल सुखाडिय़ा विश्वविद्यालय नैक से 'ए' ग्रेड प्राप्त यूनिवर्सिटी है, लेकिन इसके परिसर में स्थित इसी का संघटक कला महाविद्यालय बदइंतजामी से लबरेज है। कॉलेज प्रबंधन इतना लापरवाह नजर आता है कि यहां न तो पुराने फर्नीचर, न ही खरीदे गए लाखों रुपए के नए सामान के टूट-फूटने पर कोई दर्द उठ रहा है।
पत्रिका टीम ने पूरे परिसर की पड़ताल की तो हालात चौंकाने वाले नजर आए। कॉलेज परिसर के पूर्वी छोर पर कॉरिडोर के कोने में बने टॉयलेट में पुरानी टूटी कुर्सियां-टेबल, अनाज रखने की कोठियां, सोफे, पानी की बोतलें, वॉटर कूलर, प्लास्टिक डस्टबिन के ढक्कन, सीढिय़ां, लोहे व कांच की खिड़कियां, ग्रास कटिंग मशीनें, ट्यूबलाइट्स पड़े थे। इनमें से डस्टबिन के ढक्कन, खिड़कियां और टॉयलेट के बाहर की ओर पड़े सिरेमिक वॉश बेसिन तो नए थे, जो सार-सम्भाल के अभाव में टूट-फूट रहे हैं। इनकी खरीदी की सरकारी कीमत की जिम्मेदारों को कोई परवाह नहीं है। सिरेमिक वॉश बेसिन तो नए के नए इधर-उधर लुढ़कते हुए टूट रहे हैं। इनके लिए कॉलेज प्रशासन ने हजारों रुपए हरेक आयटम पर चुकाए हैं। कॉलेज के प्रथम तल पर चल रहे कक्षा-कक्षों के निर्माण कार्य के तहत खरीदी गई सामग्री टूट-फूट रही है। उद्यान के पास भी कई लकड़ी के टेबल-कुर्सी कबाड़ के रूप में डाल रखे हैं।
- इनके लिए पानी का भी नहीं मोल
निर्माण कार्य के तहत यहां इस्तेमाल हो रहे पानी की बर्बादी को लेकर भी कोई गम्भीर नहीं है। प्रथम तल से नीचे की ओर धड़ल्ले से पानी बह रहा था। उस वक्त वहां न तो कोई तराई हो रही थी, न ही कोई और कार्य चल रहा था। सैकड़ों लीटर साफ पानी बहकर नाली में चला जा रहा था।
- 19 चतुर्थश्रेणी कर्मचारी, उजड़ा पड़ा उद्यान
कहने को तो यहां 10 स्थायी और नौ अस्थायी चतुर्थश्रेणी कर्मचारी हैं, लेकिन कॉलेज के अन्दर उद्यान उजड़ा पड़ा है। न तो घास और हरियाली नजर आती है, न साफ-सफाई। कहीं कार्टन बिखरे पड़े हैं, तो कहीं स्टील के वॉश बेसिन में रेती-सीमेंट भरने से वह बंद पड़े हैं। कॉलेज में करीब दो हजार विद्यार्थी प्रवेशित हैं। 13 स्थायी और 11 संविदा पर कार्यरत बाबुओं के अलावा यहां शैक्षणिक स्टॉफ में 72स्थायी शिक्षक भी हैं।
Published on:
19 Jan 2020 11:56 pm
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